Uttarakhand's crisis, system and nature became ruthless

उत्तराखंड का संकट, व्यवस्था और प्रकृति हुई निष्ठुर

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Uttarakhand's crisis, system and nature became ruthless

Uttarakhand's crisis, system and nature became ruthless : उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर में 4000 से अधिक घरों को गिराने के अभियान पर तात्कालिक रोक लगाकर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) जहां पीड़ितों के दर्द को समझा है, वहीं सरकार एवं प्रशासनिक कठोरता पर भी प्रहार किया है। सरकार के लिए जैसे सबकुछ रोबोटिक होता है, सालों तक किसी जमीन पर कब्जे जारी रहेंगे, वहां पर रहने वालों के राशन कार्ड, बिजली कनेक्शन और अन्य सबकुछ भी तैयार होता रहेगा, लेकिन फिर एकाएक नींद खुलती है और वहां सब कुछ गलत ठहरा दिया जाता है। हल्द्वानी में रेलवे की 29 एकड़ जमीन पर बसे लोगों को जब रातों-रात हटने को कहा गया तो उनके पास सर्वोच्च अदालत के पास जाने के और कोई चारा नहीं था।
 

कहा जा रहा है कि ये घर रेलवे की जमीन (railway land) अतिक्रमित कर अवैध रूप से बनाए गए हैं। करीब 50,000 से भी ज्यादा लोगों को राहत देते हुए शीर्ष अदालत ने इस मामले में कई जरूरी सवाल भी उठाए। हैरत में डालने वाली बात यह रही कि कानून और उसके पालन से जुड़े उन बुनियादी पहलुओं की तरफ पहले किसी का ध्यान नहीं गया। यह भी नहीं देखा गया कि रेलवे के कथित मालिकाना हक वाली जमीन पर बने जिन घरों को अवैध बता कर गिरा देने की बात कही जा रही है, उनमें से कई आजादी से पहले के बने हैं। उन घरों से जुड़े सारे दस्तावेज इन लोगों के पास हैं। इसी अवैध बताई जा रही कॉलोनी में सरकारी स्कूल (Government School) और कॉलेज भी चल रहे हैं। इस जमीन के कुछ हिस्से को राज्य सरकार अपना बता रही है। ऐसा कोई सीमांकन नहीं हुआ है कि रेलवे की जमीन कहां तक है और कहां से राज्य सरकार की जमीन शुरू होती है। इन सबके बावजूद इस क्षेत्र के लोगों पर तब मानो वज्रपात हो गया, जब उत्तराखंड हाईकोर्ट की एक पीठ ने 20 दिसंबर को यह निर्देश जारी कर दिया कि सात दिन का नोटिस जारी कर इस इलाके को बलपूर्वक खाली कराया जाए और इन अवैध निर्माणों को गिरा दिया जाए।
 

पीढिय़ों से रह रहे लोग कहां जाएंगे, बेघर-बार होकर कैसे रहेंगे, इस पर कोई बात नहीं। इन लोगों के पुनर्वास (Rehabilitation) की क्या व्यवस्था है, इस पर कोई चर्चा नहीं। सबसे बड़ी बात यह कि उत्तराखंड की निर्वाचित सरकार ने भी इस बारे में कोई चिंता जाहिर करना जरूरी नहीं समझा, जबकि इस अभियान से प्रभावित निवासी इसकी उम्मीद कर रहे थे। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से लोग ऐसी आशा करते भी हैं। खैर, इन हालात में हताश-निराश और बदहवास पीडि़त कड़ाके की ठंड में सडक़ों पर आ गए। महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग धरने पर बैठे रहे कि किसी तरह उनका घर बचे। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपने फैसले में बिलकुल ठीक कहा कि बरसों से एक जगह रह रहे 50,000 लोगों को इस तरह सात दिन के नोटिस पर उजाड़ा नहीं जा सकता। इस मामले की अगली सुनवाई 7 फरवरी को है। राज्य सरकार और रेलवे से भी जवाब मांगा गया है। वहां मामले के सभी पहलुओं पर बारीकी से विचार होगा। लेकिन महत्वपूर्ण कसौटी सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए तय कर दी है कि मामले का कोई ‘व्यावहारिक हल’ निकालना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का ऐसे अन्य मामलों में भी ध्यान रखा जाएगा।
 

गौरतलब है कि उत्तराखंड (Uttarakhand) के ही जोशीमठ (Joshimath) में भी आजकल निवासी एक बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं। उनके आवास उनके हाथों से चले गए हैं। जिस जगह पर उनके घर बने हैं, उसकी जमीन खिसक रही है। अब तक सैकड़ों लोगों को इस कडक़ती ठंड में अपने आवासों से दूर अस्थाई शैड (Temporary Shed) में दिन-रात गुजारने को मजबूर होना पड़ रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि जोशी मठ मोरेन पर बसा हुआ है। मोरेन ग्लेशियर के ऊपर लाखों टन मिट्टी, चट्टानें आदि होती हैं। सालों की प्रक्रिया के बाद बर्फ पिघलती है और ग्लेशियर पीछे की ओर खिसक जाता है। अब इस समस्या के लिए किसे दोष दिया जाए। पहाड़ पर वैसे भी आजकल जिस तरह से अंधाधुंध निर्माण कार्य चल रहे हैं, उससे प्राकृतिक आपदाओं का संकट लगातार बढ़ रहा है। उत्तराखंड (Uttarakhand) में ग्लेशियर टूटना, बादल फटना आदि जैसी घटनाएं पहले की तुलना में आजकल ज्यादा हो रही हैं। तब इन्हें मानव रचित घटना कहा जाए। दरअसल, पहाड़ों का सीना खोखला होता जा रहा है और इंसान अपने विकास के लिए प्रकृति की अनदेखी करने पर उतारू है। जाहिर है, यह बहुत बड़ा संकट है, इसका समाधान आवश्यक है। एकतरफ इंसानी जरूरतें हैं तो दूसरी तरफ पहाड़ का दुख। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही इंसान को चलना होगा। 

 

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