देहरादून-मसूरी मार्ग पर भूस्खलन का बढ़ता खतरा: वैज्ञानिक अध्ययन में चार ढालें बेहद अस्थिर, भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी

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Rising landslide risk on the Dehradun-Mussoorie route

देहरादून। Rising landslide risk on the Dehradun-Mussoorie route, मसूरी रामार्ग पर बढ़ती भूस्खलन की घटनाओं के बीच इस पूरे क्षेत्र की संवेदनशीलता की चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है।

एक अंतरराष्ट्रीय विज्ञानी अध्ययन पाया गया कि देहरादून-मसूरी राजमार्ग पर चिन्हित 18 सड़क कटिंग वाली ढालों में से चार ढालें बेहद अस्थिर हैं, जबकि कुछ अन्य ढालें भी भविष्य में भारी वर्षा और अनियोजित निर्माण के कारण खिसक सकती हैं।

यह शोध धर्मेंद्र कुमार (भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान-इसरो, देहरादून), अनुग्रह रोहिणी लाल (ग्राफिक एरा डीम्ड विश्वविद्यालय, देहरादून), स्वाति मंडल (बनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान), डा आशीष मणि (एमिटी स्कूल आफ नेचुरल रिसोर्सेज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट, एमिटी विश्वविद्यालय, नोएडा) ने संयुक्त रूप से किया।

 18 संवेदनशील ढालों का चयन

शोध का उद्देश्य देहरादून-मसूरी मार्ग की सड़क कटिंग वाली ढालों की स्थिरता का वैज्ञानिक आकलन करना और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का मानचित्र तैयार करना था।

शोधकर्ताओं ने देहरादून से मसूरी तक 18 संवेदनशील ढालों का चयन कर उनका विस्तृत क्षेत्रीय सर्वेक्षण किया। चट्टानों की मजबूती, ढाल का कोण, दरारों की दिशा, भूगर्भीय संरचना और वर्षा के प्रभाव का आकलन करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की भू-तकनीकी तकनीकों का उपयोग किया गया।

इसके साथ ही भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहचान के लिए आवृत्ति अनुपात (फ्रीक्वेंसी रेशियो) माडल अपनाया गया, जिसमें ढाल, ढाल की दिशा, ऊंचाई, भूमि की वक्रता, वर्षा, चट्टानों का प्रकार, जलधाराओं से दूरी और भूगर्भीय दरारों से दूरी जैसे आठ प्रमुख कारकों का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन में झड़ीपानी क्षेत्र की ढाल संख्या 3, 4 और 6 तथा हाथीपांव-मसूरी मार्ग की ढाल संख्या 10 को वर्तमान में बेहद अस्थिर पाया गया। वहीं जूनू जलप्रपात के आसपास की ढालें अपेक्षाकृत स्थिर मिलीं। विज्ञानियों ने आगाह किया कि जो ढालें अभी आंशिक रूप से अस्थिर हैं, वे भी लगातार भारी वर्षा और अव्यवस्थित निर्माण गतिविधियों के कारण भविष्य में बड़े भूस्खलन का कारण बन सकती हैं।

सांख्यिकीय परीक्षण में खरा उतरा माडल

शोध में तैयार माडल की विश्वसनीयता की जांच के लिए सांख्यिकीय परीक्षण किए गए। इसमें एरिया अंडर कर्व का मान 61 प्रतिशत तथा पूर्वानुमान क्षमता 78 प्रतिशत दर्ज की गई, जिसे शोधकर्ताओं ने स्वीकार्य सटीकता माना है। उनका कहना है कि यह माडल भविष्य में सड़क निर्माण, ढालों के सुदृढ़ीकरण और आपदा जोखिम प्रबंधन की योजना बनाने में उपयोगी हो सकता है।

शोध का निष्कर्ष है कि मसूरी क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं बढ़ रहा, बल्कि तेजी से हो रहा शहरीकरण, सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ों की कटिंग, अनियोजित निर्माण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही तीव्र वर्षा भी ढालों को कमजोर कर रही है।

वैज्ञानिकों ने जोखिम वाले स्थलों की नियमित निगरानी, वैज्ञानिक तरीके से ढालों का सुदृढ़ीकरण, प्रभावी जल निकासी व्यवस्था और निर्माण कार्यों से पहले अनिवार्य भू-तकनीकी जांच की सिफारिश की है।