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This advice for fatty people

मोटे लोगों के लिए आई यह सलाह, जल्द कर लें यह काम…नहीं तो

मोटापे से जूझ रहे लोग जल्द करायें अपना वैक्सीनेशन
फैटी लीवर से जूझ रहे रोगियों पर कोरोना संक्रमण का हो सकता है जल्दी अटैक
पीजीआई के हिपेटोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की दलील, तुरंत अस्पताल पहुंचा सकता है ऐसे रोगियों में हुआ कोरोना संक्रमण, टिकेगा भी ज्यादा देर
केवल शराब पीने वालों में ही नहीं होता फैटी लीवर, आरामतलब जिंदगी जीने वालों में भी लीवर की गंभीर बीमारियां

चंडीगढ़(साजन शर्मा): फैटी लीवर से जूझ रहे रोगियों पर भी कोरोना संक्रमण का जल्दी अटैक हो सकता है। ऐसा पीजीआई के हिपेटोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टरों की दलील है। फैटी लीवर के मरीज को अगर संक्रमण होता है तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचा सकता है। उनमें संक्रमण अन्य रोगियों के मुकाबले ज्यादा देर तक टिक सकता है। फैटी लीवर के मरीजों को इस समय में अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है और उन्हें जितनी जल्दी हो सके अपना वैक्सीनेशन करा लेना चाहिए।

बुजुर्गियत,मधुमेह, उच्च रक्तचाप व दिल से जुड़ी बीमारियां तो कोरोना संक्रमण के लिए पहले से मुफीद थी लेकिन अब मोटापा व फैटी लीवर से जूझ रहे लोगों पर भी इसका खतरा है। पीजीआई के हिपेटोलॉजी विभाग के प्रोफेसर अजय डुसेजा और प्रो. वीरेंद्र सिंह का कहना है कि फैटी लीवर वाले मरीजों में भी कोविड 19 संक्रमण जल्दी फैलता है। शोध बताते हैं कि नॉन एल्कोहोलिक फैटी लीवर डिजीज (एनएएफएलडी) या नॉन एल्कोहोलिक स्टीटो हेपेटाइटस (नैश)से ग्रसित मरीजों में इसके जल्द फैलने के सबूत मिले हैं। प्रो. वीरेंद्र सिंह के मुताबिक लाइफस्टाइल में थोड़ा बदलाव कर और एक्सरसाइज इत्यादि कर अपना बॉडी वेट घटाकर इससे बचा जा सकता है। अन्य रिस्क फैक्टर जैसे मधुमेह, हाइपरटेंशन व डिसलिपिडिमिया जैसी बीमारियों को भी कंट्रोल कर लेना चाहिए।

प्रो. वीरेंद्र सिंह के मुताबिक नैश के मरीजों को लीवर की सूजन व फाइब्रोसिस से बचाने के लिए दवाओं का चयन भी सोच समझ कर किया जाता है। प्रो. वीरेंद्र सिंह के मुताबिक मोटापे से ग्रसित लोगों में बेरियेट्रिक बैलून एवं बेरियेट्रिक सर्जरी काफी लाभदायक रहती है। डा.अजय डुसेजा और डा. वीरेंद्र सिंह के मुताबिक एनएएफएलडी और नैश चूंकि लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां हैं लिहाजा पब्लिक को इस संदर्भ में जागरूक करना बहुत ही जरूरी है। यह बीमारियां बड़े ही चुपचाप तरीके से शुरू होती हैं और लीवर को पूरी तरह खराब कर देती हैं। इंटरनेशनल नैश डे पर इस मर्तबा इन्हीं बीमारियों से कोविड रिस्क होने को लेकर 13 जून को इस पर वेबिनार के माध्यम से बातचीत की जाएगी।

बॉक्स नॉन एल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटस यानि नैश फैटी लीवर की गंभीर किस्म है। यह उन 15 से 20 प्रतिशत लोगों में होती है जो शराब नहीं पीते। इसीलिए इसे नॉन एल्कोहोलिक फैटी लीवर डिजीज का नाम दिया गया है। दुनिया भर में यह लीवर की होने वाली आम बीमारी है। खासतौर से जो लोग मोटे होते हैं या जिनका वजन ज्यादा होता है, जिन्हें मधुमेह या उच्च रक्तचाप है या डिसलिपिडिमिया है उन्हें इसके होने का ज्यादा रिस्क है। एनएएफएलडी लाइफस्टाइल डिजिज है लिहाजा इससे दुनिया भर की अंदाजन 25 से 30 प्रतिशत आबादी प्रभावित है। प्रो. अजय डुसेजा के मुताबिक एक पब्लिश डॉटा के मुताबिक भारत में इस बीमारी से शहर की 16 से 53 प्रतिशत आबादी प्रभावित है। चंडीगढ़ में भी ओवरवेट, मधुमेह, हाइपरटेंशन और डिसलिपिडिमिया के अच्छी खासी तादाद में मरीज हैं लिहाजा उन्हें भी यह बीमारी प्रभावित कर रही है।

प्रो. वीरेंद्र सिंह ने बताया कि कोविड कॉल से पहले वह पीजीआई के लीवर क्लीनिक में 100 से 125 नए मरीजों को हर महीने देखते थे। आरामतलब जिंदगी की वजह से व्यक्ति का वजन बढ़ता है या उसमें मोटापा आता है और शरीर पर चर्बी जमा होती है। यह चर्बी शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुंच जाती है। लीवर इसके लिए सबसे मुफीद जगह है। ज्यादा फैट जमा होने की वजह से फैटी लीवर होने लगता है। कई मरीजों में लीवर पर सूजन आ जाती है जिसे फाइब्रोसिस (स्कॉरिंग) कहते हैं जिसे तकनीकी भाषा में नैश कहा जाता है। मेटाबोलिक सिंड्रोम वाले मरीजों जिन्हें ओवरवेट,डायबीटिज, हाइपरटेंशन और डिसलिपिडिमिया की समस्या है में नैश होने की ज्यादा आशंका है। जेनेटिक्स व इंटेस्टाइनल बैक्टीरिया भी नैश के होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फैटी लीवर के मरीजों में नैश लगातार बढ़ता रहता है और लीवर को डैमेज कर देता है। उन्हें लीवर सिरोसिस या लीवर कैंसर हो जाता है।

प्रो. वीरेंद्र सिंह के मुताबिक ऐसे मरीजों में तुरंत लीवर बदलने की जरूरत होती है। क्रिप्टोजेनिक सिरोसिस या क्रिप्टोजेनिक लीवर कैंसर होने की वजह भी नैश ही है, अगर दूसरे रिस्क फैक्टरों को अलग कर दिया जाए। डा. अजय डुसेजा ने बताया कि विभाग में कुछ साल पहले स्टडी की गई थी जिसमें पाया गया था कि क्रिप्टोजेनिक सिरोसिस या क्रिप्टोजेनिक लीवर कैंसर के मरीजों में ओवरवेट, शूगर, हाइपरटेंशन या डिसलिपिडिमिया जैसी बीमारियां भी पाई गई। वायरल हैपेटाइटिस के मरीजों में यह अतिरिक्त बीमारियां नहीं थी। इसमें सामने आया कि कई साल तक इन मरीजों में नैश की बीमारी पता नहीं चल पाई। सिरोसिस और लीवर कैंसर होने पर ही इसका पता चला।

फैटी लीवर के मरीज में शुरुआती लक्ष्ण पता नहीं चलते लेकिन जब मरीज को तेज पेट दर्द होता है तो इसका खुलासा होता है। प्रो. वीरेंद्र सिंह के मुताबिक लीवर एंजाइम बढऩे या चैकअप के दौरान इसकी जानकारी मिलती है। अल्ट्रासाउंड के जरिये फैटी लीवर को जाना जा सकता है। सभी मरीजों में इससे पता नहीं चल पाता लिहाजा नैश जैसी लीवर की गंभीर बीमारी जांचने के लिए कई सारे नॉन इनवेसिव टेस्ट या लीवर बायोप्सी की जाती है। नैश के मरीजों का इलाज भी महज फैटी लीवर के मरीजों से अलग रहता है।

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