बिहार में शिक्षा का बदलता परिदृश्य: सुधार, उपलब्धियां और चुनौतियां
The Changing Landscape of Education in Bihar
पटना। The Changing Landscape of Education in Bihar, बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में हुए परिवर्तन की चर्चा से पहले यहां पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का उस पोस्ट का उल्लेख करना लाजिमी है जो उन्होंने दो नवंबर 2025 को अपने एक्स हैंडल पर की थी।
उस पोस्ट में नीतीश कुमार ने वर्ष 2005 के बाद बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में हुए परिवर्तनों पर विस्तार से चर्चा की थी। उन्होंने लिखा था कि बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में सरकार ने कई अभूतपूर्व कार्य किए गए। सरकारी शिक्षकों की संख्या छह लाख हो गयी है।
स्थानीय निकायों के माध्यम से नियोजित 3.68 लाख शिक्षकों काे सक्षमता परीक्षा के माध्यम से नियमित किया गया। इस पोस्ट की चर्चा इसलिए आवश्यक है कि अपने कार्यकाल में बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीति में शिक्षा सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता में रही।
यही मूल वजह रही कि बिहार का बजट का सर्वाधिक 20 प्रतिशत से ज्यादा का हिस्सा शिक्षा में गुणात्मक सुधार और बड़े स्तर पर आधारभूत संरचना का विकास करने पर व्यय किया जाता रहा है।
इसकी नजीर यह है कि वर्ष 2005-06 में जहां शिक्षा का कुल बजट 4366 करोड़ करोड़ रुपये हुआ करता था। वहीं, वर्ष 2026-27 में शिक्षा का रिकार्ड बजट 68,216.95 करोड़ रुपये है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलाव पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीति की गहरी छाप रही। आजादी के बाद पहली बार प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा और तकनीकी एवं चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए।
नये-नये शिक्षण संस्थान खोले गए। पुराने संस्थानों का कायाकल्प हुआ। आधी आबादी के उत्थान हेतु स्त्री शिक्षा को प्राथमिकता दी गई। इसका असर हर परिवार के ऊपर सकारात्मक रूप से पड़ा।
नीतीश कुमार की स्पष्ट नीति और नीयत का ही यह प्रबल प्रभाव रहा कि आज लड़कियां शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में आज पुरुषों की बराबरी में परचम लहरा रही हैं।
दरअसल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लागू साइकिल और पोशाक समेत अन्य योजनाओं का ही यह असर रहा कि स्कूली शिक्षा में लड़कियों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज की गई। आज स्कूली शिक्षा में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं।
जब छात्र-छात्राओं की संख्या में वृद्धि होने लगी तब नीतीश सरकार ने स्कूलों में आधुनिक सुविधाओं, बुनियादी ढांचे के विकास, शिक्षक नियुक्ति और उनके प्रशिक्षण के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार पर लाने पर प्राथमिकता दिया।
इतना ही नहीं, पंचायत स्तर पर बेहतर शिक्षा के लिए माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय तथा प्रखंड स्तर पर माडल स्कूल, महाविद्यालयविहीन प्रखंडों में नये कालेजों की स्थापना की गई।
स्कूली शिक्षा के बाद बिहार के मेधावी बच्चों को उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के लिए राज्य से बाहर नहीं जाना पड़े, इसे ध्यान में रखते हुए नीतीश कुमार ने बड़ी संख्या में नये यूनिवर्सिटी, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, पॉलिटेक्निक संस्थान, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, नर्सिंग कॉलेज, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के विधि संस्थान तथा प्रबंधन संस्थान समेत अन्य इंस्टीट्यूट स्थापित किए।
2005 के पहले शिक्षा का बुरा हाल
नीतीश कुमार का कार्यकाल शुरू होने से पूर्व यानी वर्ष 2005 से पहले बिहार में शिक्षा का हाल बहुत बुरा था। उच्च
शिक्षण संस्थान जहां राजनीतिक व अराजकता के अखाड़े बने हुए थे तो वहीं स्कूली शिक्षा का मॉडल चरवाहा विद्यालय पर आकर सीमित हो गया था।
हाल यह था कि छात्र-छात्राएं विद्यालय नहीं जा पाते थे। सरकारी विद्यालयों के भवन जर्जर हो चुके थे। राज्य में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी। शिक्षा के लिए बुनियादी ढांचे का घोर अभाव था। विद्यालयों में बच्चों को बैठने के लिए बेंच-डेस्क उपलब्ध नहीं थे। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की काफी कमी थी।
1990 से 2005 के बीच राज्य में शिक्षकों की नियुक्ति नाम मात्र की हुई थी। उस वक्त राज्य में 65-70 बच्चों पर मात्र एक शिक्षक होता था। लगभग 12.5 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे, जो स्कूलों से पूरी तरह से बाहर थे। राज्य में शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो चुकी थी।
सत्ता में बैठे लोगों ने शिक्षा को भद्दा मजाक बनाकर रख दिया था। दसवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए राज्य में अच्छे कालेज और शैक्षणिक संस्थान नहीं के बराबर थे। उच्च और तकनीकी शिक्षा के लिए अच्छे संस्थानों का घोर अभाव था। सत्र इतनी देर से चलता था कि छात्रों को स्नातक की पढ़ाई पूरी करने और डिग्री हासिल करने में पांच-छह वर्ष तक लग जाते थे।
राज्य में नये विद्यालयों के निर्माण के बजाय ‘चरवाहा विद्यालय’ खोलकर शिक्षा के प्रति अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों की इतिश्री समझ ली गयी थी।
उच्च शिक्षण संस्थान खंडहर बनते जा रहे थे और मेधावी छात्रों को राज्य से बाहर पलायन हो रहा था। ऐसे हालात में नीतीश कुमार ने जब बिहार की सत्ता संभाली तब उनके सामने शिक्षा, सड़क और कानून व्यवस्था सुधार समेत अन्य चुनौतियां पहाड़-सी खड़ी थीं।
संयुक्त राष्ट्र में हुई साइकिल योजना की चर्चा
24 नवंबर 2005 को नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में एनडीए सरकार का गठन हुआ। तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्राथमिकता के आधार क्रमवार शिक्षा-व्यवस्था में सुधार लाने का काम शुरू किया। इसके लिए सबसे पहले सरकार ने शिक्षा का बजट में साल दर साल लगातार बढ़ोतरी की।
शिक्षा का बजट बढ़ा तो राज्यभर में युद्ध स्तर पर नये-नये विद्यालय भवनों के निर्माण कार्य कराए गए। साथ ही, पुराने विद्यालय भवनों के जीर्णोद्धार का कार्य कराया गया।
वर्ष 2005 में राज्य में जहां कुल 53 हजार 993 विद्यालय थे, वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 80 हजार 812 हो गयी है। वर्तमान में प्रदेश भर के 97.61 प्रतिशत टोले सरकारी विद्यालयों के आच्छादित हो चुके हैं।
सभी पंचायतों में उच्च विद्यालय की स्थापना और 12वीं तक की पढ़ाई की व्यवस्था हुई ताकि छात्राओं को पढ़ाई के लिए दूर नहीं जाना पड़े और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में सुविधा मिल सके। इस बीच सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या भी निरंतर बढ़ायी गई।
वर्तमान में सरकारी विद्यालयों में छह लाख से ज्यादा शिक्षक कार्यरत हैं। राज्य में इतनी बड़ी संख्या में शिक्षक नियुक्ति की चर्चा जहां आज देशभर में की जा रही है वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ में
बिहार में स्कूली शिक्षा में सुधार लाने हेतु लागू की गई मुख्यमंत्री बालिका साइकिल व पोशाक योजना की चर्चा हुई।दरअसल, वर्ष 2008 में नौवीं कक्षा की छात्राओं के लिए साइकिल योजना शुरू की गयी थी, जिसकी सराहना दुनिया के कई देशों में हुई और दूसरे राज्यों ने भी साइकिल योजना को अपनाया।
बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2010 से साइकिल योजना का लाभ लड़कों को भी देने की घोषणा की। इसके फलस्वरूप आज मैट्रिक और इंटरमीडिएट में छात्राओं की संख्या छात्रों से भी अधिक हो गई है।
मुख्यमंत्री साइकिल योजना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहे जाने के बाद इसका अनुकरण अफ्रीका महादेश के जाम्बिया देश में शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए अपनाया गया।
संयुक्त राष्ट्र की सलाह पर जाम्बिया की सरकार के अलावा माली समेत अन्य सात देशाों में भी इस योजना को लागू करने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है जिसकी चर्चा बिहार विधानसभा में भी हुई है।
दरअसल, नीतीश कुमार ने लड़कियों को माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने के प्रति प्रोत्साहन देने हेतु साइकिल योजना को लागू किया था, जिसे लड़कों के लिए भी नौवीं कक्षा में लागू कर दिया गया। इसके अच्छे परिणाम सामने आए और कक्षा नौवीं से 12वीं तक में ड्रापआउट दर कम हो गए और शिक्षा को बढ़ावा मिला।
यही वजह रही कि संयुक्त राष्ट्र ने इस मॉडल की तारीफ की है और इसके कार्यान्वयन में सहयोग किया है। अमेरिका की नार्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निशिथ प्रकाश ने जाम्बिया में इस मॉडल पर अध्ययन भी किया, जिसमें इसके परिणाम बहुत ही उल्लेखनीय पाए गए।
धीरे-धीरे इस मॉडल को अपने देश के कई अन्य राज्यों ने भी अपनाया। इससे पहले नीतीश सरकार ने वर्ष 2006-07 में सभी स्कूली छात्र-छात्राओं के लिए मुख्यमंत्री पोशाक योजना की शुरुआत की थी जिसकी देश-दुनिया में खासी चर्चा हुई थी।
शिक्षा में और सुधार लाने तथा छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहन देने के लिए नीतीश सरकार ने पहली कक्षा से स्नातक तक में छात्रवृत्ति योजना को लागू कर रखा है।
आगे की चुनौतियां: पढ़ाई बीच में छोड़ने (ड्रापआउट) की दर को रोकना
नेतृत्व परिवर्तन के बाद नई सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती स्कूली शिक्षा में ड्रापआउट की दर को रोकना होगा। साथ ही, उच्च नामांकन में बढ़ोतरी दर को तेज करना होगा। उच्च नामांकन का अर्थ तभी होता है जब बच्चे अपनी शिक्षा जारी रखें और विद्यालय में बने रहें।
पढ़ाई बीच में छोड़ने के लिए जिम्मेदार कारक आमतौर पर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक और अवसंरचनात्मक श्रेणियों में आते हैं, जो बिहार में अलग-अलग स्तर पर मौजूद हैं।
इसलिए, बच्चों को पढ़ाई बीच में छोड़ने की समस्या से निपटने के लिए सावधानीपूर्वक योजना बनाना आवश्यक है, जिसमें जोखिम वाले बच्चों की पहचान और सहायता के लिए निवारक उपाय और लक्षित हस्तक्षेप दोनों शामिल हों।
यह सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है कि बच्चे न केवल नामांकन लें बल्कि स्कूली शिक्षा प्रणाली में सक्रिय रूप से भाग भी लें और प्रगति करें।
फरवरी 2026 में बिहार विधानसभा का बजट सत्र में शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने कहा था कि बिहार के सरकारी विद्यालयों में ड्रापआउट की दर एक प्रतिशत से भी कम रह गई है। इसमें सर्वाधिक मामले प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग के बच्चों में पायी गई है।
दूसरी चुनौती उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को बढ़ाने की है जो अभी 18 प्रतिशत के आसपास है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुरूप बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास जैसी चुनौतियों का भी सामना करना जारी होगा। इन सब के बीच नई सरकार के लिए बिहार को वैश्विक शिक्षा व्यवस्था के समक्ष खड़ा करना भी कम चुनौती नहीं होगी।