शिमला में आवारा कुत्तों का आतंक: पिछले 3 साल में 52,702 लोगों को काटा; सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जागा नगर निगम

शिमला में आवारा कुत्तों का आतंक: पिछले 3 साल में 52,702 लोगों को काटा; सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जागा नगर निगम

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Stray dogs wreak havoc in Shimla: 52,702 people have been bitten

शिमला। जिला शिमला में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक और लगातार हो रहे डॉग बाइट मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद नगर निगम प्रशासन हरकत में आ गया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है और आवारा कुत्तों को पकड़ने, उनकी नसबंदी करने तथा सार्वजनिक स्थलों से हटाने के लिए स्थानीय निकायों को प्रभावी कदम उठाने होंगे। खतरनाक कुत्तों को लेकर भी कोर्ट ने कड़ी कार्रवाई के संकेत दिए हैं।

शिमला शहर में स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन वर्षों में 52,702 लोगों को आवारा कुत्तों ने काटा है। इस दौरान रैबीज के कारण तीन लोगों की मौत भी हो चुकी है। लगातार बढ़ रहे मामलों ने नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

4 हजार कुत्तों की नसबंदी

नगर निगम शिमला के तहत अब तक करीब 4,000 आवारा कुत्तों की नसबंदी कर उन्हें टैग किया जा चुका है। वहीं अब शहर के लगभग 1,000 और आवारा कुत्तों की नसबंदी और टैगिंग का काम शुरू किया गया है। इसके लिए चंडीगढ़ की एक फर्म को जिम्मेदारी सौंपी गई है। निगम प्रशासन प्रत्येक कुत्ते पर करीब 1,500 रुपये खर्च कर रहा है।

महापौर सुरेंद्र चौहान ने कहा कि नगर निगम आवारा कुत्तों की समस्या को गंभीरता से ले रहा है और नसबंदी अभियान लगातार चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि शहर में कुत्तों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया है ताकि लोगों को राहत मिल सके।

हालांकि बड़ा सवाल यह है कि अब तक सभी आवारा कुत्तों की नसबंदी क्यों नहीं हो पाई। निगम अधिकारियों के अनुसार बजट, संसाधनों की कमी और पर्याप्त डॉग कैचर टीमों का अभाव बड़ी बाधा बना हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों में कुत्तों को पकड़ना भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

कई इलाकों में खतरनाक कुत्तों का आतंक

शहर के कई इलाकों में अब भी खतरनाक कुत्तों का आतंक बना हुआ है। खासकर स्कूलों, बाजारों और रिहायशी क्षेत्रों में लोगों को झुंड में घूमने वाले कुत्तों से खतरा बना रहता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई धीमी रहती है। अभी तक नगर निगम के पास “खतरनाक कुत्तों” को अलग से चिन्हित करने की कोई स्पष्ट और स्थायी व्यवस्था पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद अब प्रशासन पर जवाबदेही बढ़ गई है। यदि आदेशों की पालना में ढिलाई पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में नगर निगम का अभियान और तेज होने की संभावना है।

शिमला में बढ़ते डॉग बाइट मामलों ने यह साफ कर दिया है कि केवल नसबंदी ही नहीं, बल्कि आवारा कुत्तों के प्रबंधन की स्थायी नीति, नियमित मॉनिटरिंग और सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की भी जरूरत है, ताकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।