Home » धर्म / संस्कृति » भक्ति में विश्वास का स्थान : कृपा सागर

भक्ति में विश्वास का स्थान : कृपा सागर

विश्वास एक ऐसा शब्द है जिससे साधारण से साधारण व्यक्ति भी परिचित है। धनवान हो या निर्धन, शिक्षित हो या अशिक्षित, शहरी हो या ग्रामीण सभी जानते हंै कि विश्वास संसार के हर रिश्ते का एक अनिवार्य अंग ही नहीं उसकी सफलता का प्रमुख द्वार है। हमारे सम्बन्ध घर-परिवार के सदस्यों के साथ हों, अपने कार्यालय या कम्पनी में अपने ऊपर या नीचे के स्तर के सहयोगियों से हों, मित्रों या ग्राहकों से हों तभी सुखद और स्थाई हो सकते हैं यदि उन्हें हमारे प्रति और हमें उनके प्रति विश्वास बना रहे, कायम रहे।

ईश्वर के साथ हमारा भक्ति का नाता है। प्रेम के साथ-साथ यहां भी विश्वास भक्ति का एक अनिवार्य अंग है, इसकी सफलता की कुंजी है। जहां प्रेम शरीरों का मोहताज है, विश्वास के लिए इष्टदेव भगवंत के गुण, उसकी शक्तियां आधार बनती हैं। इसीलिए आध्यात्मिक जगत में प्राय: विश्वास की बजाय ‘श्रद्धा शब्द का प्रयोग किया जाता है। भक्ति में जब हम निराकार प्रभु परमात्मा से प्रेम करना चाहते हंै तो साकार सत्गुरु, ब्रह्मज्ञानी संतों अथवा इसके बन्दों को माध्यम बना लेते हैं परन्तु श्रद्धा सीधे ही निरंकार में व्यक्त करते हैं। श्रद्धा में एक अवस्था ऐसी भी आ जाती है जब भक्त और भगवन्त एक हो जाते हैं और भक्त निराकार से वह नोंक-झोंक कर जाते हैं जो साधारणत: प्रेम-संबंध में होती है, जैसे-

जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता,
पतित् पावन नाम तेरो कैसे हुंता!

अर्थात् यदि हम पाप नहीं करते तो तुम पतित-पावन कैसे कहलाते, यानि यदि आप हमारे लिए विशेषता रखते हैं तो आपके लिये हमारा अस्तित्व भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
इसी प्रकार –

जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बंधन तुम बांधे,
अपने छूटन कउ जतन करौ हम छूटे तुम आराधे।

अर्थात् हे ईश्वर! यदि तुमने हमें मोह माया के बंधनों में जकड़ रखा है तो हमने भी तुम्हें अपने प्रेम के बंधन में जकड़ लिया है। हम तो तुम्हारी आराधना करके छूट जायेंगे मगर तुम हमारे प्रेम के बन्धन से कैसे छूट पाओगे?

भक्ति में विश्वास अथवा श्रदा का अर्थ है पूर्ण समर्पण। हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना तो करते हैं मगर यह अधिकार ईश्वर को ही देते हैं कि यह हमें क्या, कितना और कब देता है, देता भी है कि नहीं देता है। हमें विश्वास रहता है कि इसका निर्णय ही हमारे हित में है। हम तो अपने हितों के बारे में अंजान हो सकते हैं मगर ईश्वर सब जानता है। यहाँ राजा जनक अपने राज-पाट का अभिमान नहीं करते और न ही कबीर जी सांसारिक पदार्थों की कमी के लिए शिकवा-शिकायत करते हैं, मगर दोनों ही एक जैसी आनन्द की स्थिति में हैं क्योंकि दोनों को ही ईश्वर ने जो कुछ प्रदान किया है उससे संतुष्ट हैं, प्रसन्न हैं। दोनों ही ब्रह्यज्ञानी हैं, ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखते हुए समर्पित भाव से विचरण करते हैं।

विश्वास हमें असत्य से निकालकर सत्य की ओर अग्रसर करता है। अनेकता की भटकन से निकालकर एक में स्थित करता है। विश्वास पूर्ण पर ही टिकेगा किसी अधूरेपन की गुंजाइश ही नहीं। यह विश्वास ही है जो हमें अपनी मंजिल परम् सत्य ईश्वर तक पहुंचाता है। हमने पूर्ण सत्गुरु पर विश्वास किया तो उसी ने हमें यह मंजिल दी जिसके बाद हमें न किसी अन्य मार्गदर्शक की आवश्यकता महसूस होती है न किसी अन्य भगवंत की।

विश्वास हमारा भाग्य बदल देता है जीवन में क्रांति लाने का कारण बन जाता है। कहा जाता है कि एक अंधा व्यक्ति हकारत ईसा मसीह जी के पास आया और कहने लगा – ÓÓप्रभु मेरी आँखों पर हाथ फेर दो मुझे विश्वास है कि मुझे मेरी नकार मिल जायेगी।ÓÓ उन्होंने लाख मना किया कि यह शक्ति मेरे पास नहीं है परन्तु नेत्रहीन व्यक्ति यही कहता रहा कि मुझे विश्वास है कि आपके हाथ फेरने से मुझे मेरी नकार मिल जायेगी।

Check Also

गुरुनानक जयंती पर विशेष : अच्छे लोगों के साथ अच्छाई फैलती है और बुरे लोगों की वजह से बुराई

मंगलवार, 12 नवंबर कार्तिक मास की पूर्णिमा है, इस दिन सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानक …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Share
See our YouTube Channel