चंडीगढ़ के बल्क मार्केट प्रोजेक्ट में कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का नोटिस

चंडीगढ़ के बल्क मार्केट प्रोजेक्ट में कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का नोटिस

National Green Tribunal Notice

National Green Tribunal's Notice

National Green Tribunal's Notice, चंडीगढ़ में पर्यावरणीय प्रोजेक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (प्रिंसिपल बेंच, नई दिल्ली) ने सेक्टर 56 में प्रस्तावित “बल्क मार्केट प्रोजेक्ट” में कथित बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय उल्लंघनों का संज्ञान लिया है।


यह मामला ओरिजिनल एप्लीकेशन संख्या 158/2026 के माध्यम से व्हिसलब्लोअर एवं आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. राजिंदर के. सिंगला द्वारा चंडीगढ़ प्रशासन के विरुद्ध दायर किया गया है। मामले की सुनवाई 13 मार्च 2026 को जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव (अध्यक्ष), डॉ ए सेंथिल वेल तथा डॉ अफरोज अहमद की पीठ द्वारा की गई।
ट्रिब्यूनल ने पाया कि मामला पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन से जुड़े गंभीर प्रश्न उठाता है जिसके तहत प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है।
लगभग 44 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई इस परियोजना में 191 एक कनाल के व्यावसायिक प्लॉट और 48 बूथ साइट्स शामिल हैं। परियोजना इ.आई.ए. (EIA) अधिसूचना, 2006 के आइटम 8(a)/8(b) के अंतर्गत आती है, जिसके लिए पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति आवश्यक है। आरोप हैं कि पर्यावरणीय स्वीकृति (EC), सी.टी.इ.(CTE) एवं सी.टी.ओ. (CTO) प्राप्त नहीं किए गए और लगभग 332 पेड़ों की कटाई बिना अनुमति के की गई। कोई पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), जन-सुनवाई या वैधानिक प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
याचिका में कहा गया है कि यह परियोजना पर्यावरणीय सिद्धांतों जैसे सतत विकास, पूर्व सावधानी सिद्धांत तथा पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन का उल्लंघन करती है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण के मौलिक अधिकार का हनन होता है।


आवेदक ने ट्रिब्यूनल से विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) कराने के निर्देश, पर्यावरणीय क्षति की भरपाई एवं पुनर्स्थापन उपाय तथा पोल्लूटर पेस प्रिन्सिपल (Polluter Pays Principle) के तहत पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की गुहार लगाई है।


एक शिक्षक से सामाजिक कार्यकर्ता बने डॉ. राजिंदर के. सिंगला पिछले तीन दशकों से पर्यावरण संरक्षण, पीड़ित लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने और शिक्षा में भ्रष्टाचार को उजागर करने में लगे हुए है जिसके कारण उन्हें एस.आर. जिंदल पुरस्कार 2011 से सम्मानित किया गया, जिसमें डॉ एपीजे अब्दुल कलाम, अन्ना हजारे और जस्टिस संतोष हेगड़े जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व भी शामिल रहे।
चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा प्रायोजित उनका शोध Parthenium hysterophorus (कांग्रेस घास) पर आधारित रहा है, जिसने पर्यावरण एवं जनस्वास्थ्य पर इसके प्रभावों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी कार्य पर आधारित उनके थीसिस पर पंजाब विश्वविद्यालय ने उन्हें पीएचडी की डिग्री प्रदान की।


ट्रिब्यूनल जाने से पूर्व, डॉ. सिंगला ने आरटीआई एवं पारदर्शिता का सहारा लेते हुए 9 सितंबर 2025 को आरटीआई आवेदन दायर किया था, लेकिन 30 दिनों की वैधानिक अवधि के बावजूद लगभग 180 दिनों तक कोई सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। इस पारदर्शिता की कमी के कारण मजबूरन उन्हें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
यह मामला बड़े विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय स्वीकृतियों और जनभागीदारी के महत्व को रेखांकित करता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का हस्तक्षेप पर्यावरणीय कानूनों के पालन और पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।