अयोध्या में भूमि अधिग्रहण पर हाई कोर्ट की अंतरिम रोक

अयोध्या में भूमि अधिग्रहण पर हाई कोर्ट की अंतरिम रोक

High Court Interim Stay

High Court's Interim Stay

लखनऊ। High Court's Interim Stay, इलाहाबाद हाई कोर्ट लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या में आवास एवं विकास परिषद की विभिन्न योजनाओं के लिए की जा रही भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही पर बुधवार को अंतरिम रोक लगा दी है।

कोर्ट ने कहा कि जिन योजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण करने को चुनौती दी गई है उन सभी में राज्य सरकार सहित सभी पक्षकार मौके पर यथास्थिति बनाए रखेंगे। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को नियत किया है। यह आदेश जस्टिस राजन राय व जस्टिस मंजीव शुक्ला की पीठ ने ग्यारह याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के दौरान पारित किया।

कोर्ट के सामने लंबे समय से सुनवाई चल रही है और बुधवार को विभिन्न याची पक्षों के अधिवक्ताओं की ओर से बहस पूरी कर ली गई। वहीं, जब कोर्ट ने आवास एवं शहरी विकास विभाग, जिलाकारी अयोध्या और आवास एवं विकास परिषद के अधिवक्ताओं से बहस करने को कहा तो उनकी ओर से पेश अधिवक्ताओं ने बहस शुरू करने में असमर्थता जताई।

इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई गुरुवार को होगी। यदि सरकार व आवास विकास की ओर से कोई अधिवक्ता बहस नहीं करता है, तो उसे लिखित बहस दाखिल करने की अनुमति दी जाएगी, क्योंकि मामले की सुनवाई लंबे समय से लंबित है और अनावश्यक स्थगन उचित नहीं है।

याचिकाओं में कहा गया है कि अयोध्या में भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम 1965 के तहत की जा रही है। इस अधिनियम में प्रविधान है कि भूमि अधिग्रहण के लिए वही नियम लागू होंगे जो भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 में हैं।

यह भी कहा गया है कि यदि किसी अन्य कानून के तहत जमीन मालिकों को अधिक लाभ मिल सकता है, तो उसी कानून का पालन किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि केंद्र सरकार ने भूमि स्वामियों को बेहतर मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकार देने के उद्देश्य से वर्ष 2013 में नया भूमि अधिग्रहण कानून लागू किया, जो 1894 के कानून से अधिक लाभकारी है।

इसमें सामाजिक प्रभाव आकलन जैसे महत्वपूर्ण प्रविधान भी शामिल हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि वर्तमान में 1965 के अधिनियम के तहत जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है, जिससे किसानों और भू-स्वामियों को कम मुआवजा और सीमित सुविधाएं मिल रही हैं।

इससे उनकी जमीनें कम कीमत पर अधिग्रहीत हो रही हैं, जो न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने प्रथमदृष्टया माना कि 1965 के अधिनियम के तहत की जा रही अधिग्रहण प्रक्रिया 2013 के कानून की तुलना में कम लाभकारी है। ऐसे में वर्ष 2020 और उसके बाद जारी अधिसूचनाओं के तहत चल रही अधिग्रहण प्रक्रिया को फिलहाल रोकना उचित है।