हरिहर योजना: एक अनाथ युवक के सवाल से जन्मी सामाजिक पहल की प्रेरक कहानी
Harihar Yojana: The Inspiring Story of a Social
चंडीगढ़। Harihar Yojana: यूं तो अधिकतर सरकारी योजनाओं की शुरुआत शीर्ष स्तर की बैठकों, फाइलों और लंबे प्रशासनिक मंथन से होती है, लेकिन ‘हरिहर’ की कहानी कुछ अलग है। योजना की बुनियाद एक अनाथ युवक के सवाल के बाद रखी जाती है, जिसमें उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल से पूछा था कि क्या 18 साल की उम्र के बाद किसी बच्चे की जिम्मेदारी खत्म हो जानी चाहिए।
पिछले दिनों एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने खुद योजना के पीछे की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम से पहले उनका प्रवास सोनीपत में था।
अगले दिन उन्हें ध्वजारोहण करना था, लेकिन उससे पहले देर रात हुई एक मुलाकात ने एक नई सामाजिक पहल की नींव रख दी। रात करीब 10 बजे एक 24 वर्षीय युवक उनसे मिलने पहुंचा। वह युवक बचपन से बालगृह में पला-बढ़ा था।
18 साल की उम्र में छोड़ना पड़ा संस्थान
नियमों के अनुसार 18 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद उसे संस्थान छोड़ना पड़ा, लेकिन संस्थान के बाहर उसका इंतजार किसी परिवार, पहचान या सहारे ने नहीं, बल्कि अनिश्चित भविष्य ने किया। युवक ने मनोहर लाल से कहा, ‘मेरी कोई पहचान नहीं है। मुझे अपने पिता का पता नहीं, मां के बारे में जानकारी नहीं। मैं अकेला नहीं हूं, ऐसे कई बच्चे हैं जो 18 साल के बाद व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं।’
यह बातचीत एक व्यक्ति की कहानी नहीं रही, बल्कि उस व्यवस्था के सामने सवाल बनकर खड़ी हो गई जो बचपन तक संरक्षण तो देती है, लेकिन युवावस्था की शुरुआत में बच्चों को अपने हाल पर छोड़ देती है।
मनोहर लाल के अनुसार इस मुलाकात के बाद यह विचार सामने आया कि ऐसे बच्चों के लिए अलग व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, ताकि बालिग होने के बाद भी वे जीवन की मुख्यधारा से कटें नहीं। इसी सोच के साथ हरिहर योजना शुरू की गई। इस योजना का उद्देश्य केवल सहायता देना नहीं, बल्कि ऐसे बच्चों को शिक्षा, पुनर्वास, रोजगार और सम्मानजनक जीवन से जोड़ना तय किया गया।
बालगृह छोड़ने के बाद बच्चों को अकेला नहीं छोड़ा जाता
हरिहर योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बालगृह छोड़ने के बाद भी बच्चों को अकेला नहीं छोड़ा जाता। योजना के तहत पात्र बच्चों को 18 वर्ष की आयु के बाद अगले सात वर्षों यानी 25 वर्ष की आयु पूरी होने तक सहायता देने का प्रविधान किया गया।
इस दौरान सरकार उनकी आगे की पढ़ाई, रहने की व्यवस्था, पुनर्वास, कौशल विकास और भविष्य की तैयारी में सहयोग करती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई बच्चा केवल इसलिए पीछे न रह जाए क्योंकि उसके पास पारिवारिक सहारा उपलब्ध नहीं है।
योजना के तहत पढ़ाई पूरी होने के बाद पात्र युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार ग्रुप-सी और ग्रुप-डी (तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी) के पदों पर रोजगार उपलब्ध कराने का प्रविधान रखा गया है। सरकार का लक्ष्य यह रहा कि सहायता केवल भरण-पोषण तक सीमित न रहे बल्कि बच्चों को आत्मनिर्भर बनाया जाए।
युवक की जिंदगी बदली
जिस युवक की बात से इस योजना की शुरुआत हुई, उसकी अपनी जिंदगी भी बदली। बाद में उस युवक को न केवल रोजगार मिला, बल्कि समय के साथ उसका विवाह भी हुआ। अब वह सामान्य पारिवारिक जीवन जी रहा है। सोनीपत की उस रात पूछा गया एक सवाल आज कई बच्चों के लिए जवाब बन चुका है।