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दिल्ली में मुफ्त यात्रा का चुनावी दांव

क्या आज के समय में कोई भी चीज फ्री संभव है? हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों के कर्ज माफी के राजनीतिक हथकंडों की खूब चर्चा होती है, सत्ता में आने के लिए राजनीतिक दल ऐसी लोकलुभावन घोषणाएं करते हैं, लेकिन बगैर किसी ठोस आधार के ये अर्थव्यवस्था पर भार ही साबित होती हैं। अब ऐसी ही एक योजना देश की राजधानी नई दिल्ली में महिलाओं के लिए घोषित की गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि जल्द दिल्ली मेट्रो और डीटीसी की सभी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा प्रदान की जाएगी। अपने सीमित संसाधनों की वजह से केंद्र की ओर से देखने वाली राज्य सरकार इसे कैसे सफल बनाएगी, इसके जवाब में मुख्यमंत्री का कहना है कि योजना पर प्रतिवर्ष करीब 1200 करोड़ रुपये का खर्च सरकार खुद उठाएगी। उन्होंने कहा है कि राज्य सरकार का खजाना सरप्लस है, इसलिए उस पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।

इसके अलावा मुख्यमंत्री केजरीवाल का यह भी कहना है कि इस योजना के लिए दिल्ली सरकार को केंद्र से बात करने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि सब्सिडी दी जा रही है, किराये में कोई फेरबदल नहीं की जा रही। हालांकि उनका यह भी कहना है कि जो महिलाएं टिकट खरीदने में सक्षम हैं, वे इस सब्सिडी को छोड़ दें ताकि जरूरतमंदों को मदद मिल सके। अभी दिल्ली की बसों और मेट्रो के कुल यात्रियों में 33 फीसदी महिलाएं होती हैं। सरकार ने इस योजना के पीछे मकसद महिलाओं की सुरक्षा को बताया है, हालांकि फ्री यात्रा के जरिये कैसे सुरक्षा ब?ेगी, यह विचार का विषय है लेकिन इस योजना के जरिये दिल्ली की महिलाओं के वोट को अपनी तरफ करने की आप की कोशिश को जरूर समझा जा सकता है।


इस योजना पर राजनीतिक सवाल तो उठ ही रहे हैं, तकनीकी सवालों से भी सरकार को सामना करना पड़ रहा है। कहा जा रहा है कि मेट्रो में स्मार्ट कार्ड या टोकन के जरिए मुफ्त सफर का प्रावधान किया जाता है तो उसके लिए किराया वसूलने के तरीकों में परिवर्तन करना पड़ेगा। ऐसे बदलावों के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी की आवश्यकता पड़ सकती है। फिर यह मसला है कि दिल्ली सरकार मेट्रो को किस तरह भुगतान करेगी, भारी कर्जे पर खड़ी दिल्ली मेट्रो क्या भुगतान में किसी देरी या चूक को बर्दाश्त कर पाएगी, दिल्ली विधानसभा का चुनाव नजदीक है, इसलिए राज्य के विपक्षी दलों ने इसे चुनाव से जोड़कर देखा है और वोट बटोरने की मंशा बताया है। उनका यह भी कहना है कि राज्य सरकार के पास पैसे हैं तो विकास कार्यों में लगाए, इस तरह सब्सिडी पर लुटा कर देश के लोगों के टैक्स की कमाई को क्या बर्बाद नहीं किया जा रहा।

गौरतलब है कि 1990 के दशक के पहले बिजली और कुछ अन्य सेवाओं में भरपूर माफी दी जाती थी, यह तात्कालिक रूप से बेशक कुछ फायदेमंद साबित होती लेकिन देश को लंबे समय तक आर्थिक रूप से पंगु बना देती थी। इसके बाद आने वाली सरकारों ने हौसला रखते हुए नई आर्थिक नीति के तहत ऐसी नीतियां छोड़ दी थीं। लेकिन पिछले दिनों केंद्र सरकार ने किसानों को नकद पैसे देने, कई राज्य सरकारों ने किसानों के कर्ज माफ किए और गरीबों को मुफ्त अनाज बांटा। कांग्रेस ने भी अपनी सरकार आने पर सालाना 72 हजार की गरीबों के लिए योजना पेश की। पार्टी ने तमाम जोड़-घटा कर यह बताया कि कैसे इस योजना को अमल में लाया जाएगा। वास्तव में ऐसी नीतियों को अब सिर्फ राजनीतिक फायदे की चीज ही समझा जाता है, उन्हें न अपनाने का सरकारों पर दबाव भी बन रहा है। हालिया लोकसभा चुनाव में आप का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है, अब दिल्ली में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ऐसी योजनाओं से खेलना उसकी मजबूरी भी जान पड़ रही है, लेकिन अगर ऐसा किया गया तो देश के दूसरे राज्य भी इसी राह पर चलने लगेंगे। क्या वास्तव में जरूरतमंद को इसका फायदा मिल सकेगा?

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