अदालत का सख्त रुख: आदेश न मानने पर पंजाब रोडवेज की वर्कशॉप कुर्क करने के निर्देश

अदालत का सख्त रुख: आदेश न मानने पर पंजाब रोडवेज की वर्कशॉप कुर्क करने के निर्देश

Court Takes Strict Stance

Court Takes Strict Stance

Court Takes Strict Stance: एक लंबे कानूनी विवाद में जिला अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब रोडवेज को बड़ा झटका दिया है। अदालत का फैसला न मानने पर जज ने पंजाब रोडवेज की इंडस्ट्रियल एरिया चंडीगढ़ स्थित वर्कशाप को कुर्क करने के आदेश जारी कर दिए। करीब डेढ़ साल पहले अदालत ने रोडवेज से रिटायर हुए कंडक्टर अशोक कुमार के हक में फैसला सुनाया था। अदालत ने रोडवेज को उनका वेतन और अन्य लाभ जारी करने के आदेश दिए थे। हालांकि रोडवेज ने इस आदेश को नहीं माना। ऐसे में अशोक कुमार ने जिला अदालत में एग्जीक्यूशन पिटीशन दायर कर दी। इसमें जिला अदालत ने रोडवेज को झाड़ लगाते हुए उनकी वर्कशाप को ही कुर्क करने के आदेश जारी कर दिया। अब भी अगर रोडवेज ने आदेश को नहीं माना तो उनके खिलाफ और सख्त आदेश जारी हो सकते हैं। 

63 वर्षीय अशोक कुमार को पंजाब रोडवेज ने 2013 में जबरन रिटायर कर दिया था। वह विभाग में कंडक्टर के पद पर तैनात थे। अदालत ने रोडवेज के फैसले को अवैध करार दिया था और उनके रुके हुए सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने के आदेश दिए थे। उनका केस लड़ने वाले एडवोकेट डीआर कैथ ने याचिका में कहा कि उनके खिलाफ एकतरफा फैसला सुनाया गया था। उनके खिलाफ विभागीय जांच नियमों के अनुरूप नहीं हुई थी और  उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित मौका ही नहीं दिया गया। अब जब अदालत ने उनके हक में फैसला सुना दिया, तब भी रोडवेज आदेश को मानने को तैयार नहीं था। इसलिए उन्होंने अदालत में एग्जीक्यूशन पिटीशन दायर की। 

यह है मामला

अशोक कुमार की नियुक्ति नवंबर 1981 में पंजाब ट्रांसपोर्ट विभाग में कंडक्टर के रूप में तौर पर हुई थी। वह जगराओं डिपो में कार्यरत थे। वर्ष 2007 में सड़क हादसे में मौत के एक मामले में उनके खिलाफ केस दर्ज हो गया था। इस केस में बठिंडा की निचली अदालत ने उन्हें दोषी करार देकर सजा सुना दी थी। हालांकि, इस फैसले के खिलाफ उन्होंने अपील दायर कर दी थी जिसमें 2014 में बठिंडा की ऊपरी अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था। इससे पहले विभाग ने 2012 में उन्हें इसी केस में दोषी ठहराकर जबरन रिटायर कर दिया था और उनकी पेंशन में पांच प्रतिशन की कटौती भी कर दी। इसके खिलाफ उन्होंने अपील की, जिसके बाद 10 जून 2015 को अपीलीय प्राधिकरण ने इन आदेशों को रद करते हुए मामले को दोबारा विचार के लिए भेज दिया। विभाग ने 2016 में फिर से लगभग वही आदेश जारी कर दिए। उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया और उनके रिटायरमेंट के आदेश को बरकरार रख दिया गया। ऐसे में उन्होंने विभाग के खिलाफ जिला अदालत में केस दायर कर दिया।