भुवन चंद्र खंडूड़ी का अवसान: सादगी, ईमानदारी और सैन्य अनुशासन के एक सुनहरे राजनीतिक अध्याय का अंत
Bhuvan Chandra Khanduri passes away
देहरादून। अटल जी की राजनीतिक दृष्टि की सबसे बड़ी पहचान यह मानी जाती थी कि वह भीड़ में भी सही इंसान पहचान लेते थे।
उत्तराखंड की राजनीति में भुवन चंद्र खंडूड़ी सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि वह अटल जी की राजनीतिक दृष्टि की सबसे मजबूत मिसाल थे।
एक रिटायर्ड फौजी अफसर, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था, उसे अटल जी ने भीड़ में पहचानकर पहाड़ की राजनीति का सबसे विश्वसनीय चेहरा बना दिया।
खंडूड़ी के निधन के साथ उत्तराखंड की राजनीति का वह अध्याय भी समाप्त हो गया, जिसमें सादगी, अनुशासन और ईमानदारी अब भी राजनीति की ताकत मानी जाती थी।
क्या जरूरत है?… और वहीं से बदल गई जिंदगी
भाजपा नेता के एक फोन ने फौजी अफसर को राजनीति की राह पर लाकर खड़ा किया। साल 1990 में देश मंडल आंदोलन की आग में जल रहा था।
छात्र आत्मदाह कर रहे थे। सेना से मेजर जनरल के पद से रिटायर हुए भुवन चंद्र खंडूड़ी दिल्ली का सरकारी घर छोड़कर देहरादून लौटने की तैयारी में थे। राजनीति में आने का न इरादा था, न महत्वाकांक्षा। तभी भाजपा के एक नेता का फोन आया 'अटल जी आपसे मिलना चाहते हैं।'
खंडूड़ी ने सहजता से पूछा 'क्या जरूरत है?' उधर से जवाब मिला 'एक बार मिल लेने में क्या बुराई है?' प्रख्यात लेखक विजय त्रिवेदी ने अपनी किताब ‘हार नहीं मानूंगा’ में लिखा है कि तय मुलाकात के बाद खंडूड़ी को पता चला कि उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी के साथ देहरादून जाना है। देश में लोकसभा चुनाव का एलान हो चुका था।
दून की सभा में खंडूड़ी मंच के पीछे बैठे रहे, लेकिन अटल जी की नजर उस शांत फौजी अफसर पर टिक चुकी थी। उन्होंने खंडूड़ी को आगे बुलाया और भाषण देने को कहा। यहीं से राजनीति में 'जनरल साहब' का जन्म हुआ।
कांग्रेस के घर से निकला भाजपा का मजबूत पहाड़ी चेहरा
खंडूड़ी के मामा थे हेमवती नंदन बहुगुणा, मां कांग्रेस में सक्रिय… लेकिन अटल ने उनका अलग मिजाज देखा। खंडूड़ी का परिवार मूल रूप से कांग्रेस की राजनीति से जुड़ा था।
उनकी मां कांग्रेस में सक्रिय थीं। मामा हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे। ममेरे भाई विजय बहुगुणा भी राजनीति में सक्रिय हो चुके थे, लेकिन अटल जी ने खंडूड़ी में वह ईमानदारी और अनुशासन देखा जिसकी भाजपा को पहाड़ में तलाश थी।
भाजपा ने उन्हें गढ़वाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाने का फैसला किया। खंडूड़ी पहले तैयार नहीं हुए। वजह भी स्पष्ट थी कि वह ममेरे भाई विजय बहुगुणा के विरुद्ध चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे।
बाद में कांग्रेस ने सतपाल महाराज को टिकट दिया और खंडूड़ी ने पहली ही लड़ाई में उन्हें हराकर लोकसभा पहुंचकर सबको चौंका दिया।
अटल का भरोसा… और दिल्ली में बढ़ता कद
अटल बिहारी वाजपेयी का भरोसा खंडूड़ी पर लगातार बढ़ता गया। पहली बार सांसद बनने के महज दो साल के भीतर उन्हें भाजपा का मुख्य सचेतक बना दिया गया। साल 1999 में अटल सरकार बनी तो खंडूड़ी को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय सौंपा गया।
यही वह दौर था जब देश में सड़कों और हाईवे की तस्वीर बदलनी शुरू हुई। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को गांवों तक पहुंचाने में उनकी बड़ी भूमिका रही। कहा जाता है कि अटल उन्हें काम में पूरी आजादी देते थे, क्योंकि खंडूड़ी पर व्यक्तिगत ईमानदारी को लेकर कभी सवाल नहीं उठे।
जब-जब संकट आया, भाजपा को याद आए खंडूड़ी
उत्तराखंड बनने के बाद भाजपा के भीतर गुटबाजी चरम पर थी। 2007 में पार्टी को ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो सरकार और संगठन दोनों को अनुशासन में रख सके।
दिल्ली ने एक बार फिर खंडूड़ी पर भरोसा जताया। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार और अफसरशाही पर सख्ती दिखाई। उनकी छवि 'कड़क मुख्यमंत्री' की बन गई।
2009 में उन्हें हटाया गया, लेकिन जब सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप बढ़े तो भाजपा नेतृत्व को फिर उसी ईमानदार चेहरे की जरूरत महसूस हुई। साल 2011 में खंडूड़ी दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर भेजे गए।
राजनीति में कम होते गए ऐसे चेहरे
भुवन चंद्र खंडूड़ी उस राजनीति के प्रतिनिधि थे, जिसमें नेता की सबसे बड़ी पूंजी उसकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता होती थी।
आज की आक्रामक और अवसरवादी राजनीति के दौर में खंडूड़ी इसलिए अलग दिखते हैं क्योंकि उन्हें सत्ता ने नहीं, भरोसे ने बड़ा बनाया था।
उत्तराखंड उन्हें सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में याद नहीं करेगा। वह हमेशा उस नेता के रूप में याद किए जाएंगे, जिसे सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने पहचाना था।