एससी-एसटी मामलों में एफआईआर दर्ज कराने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

एससी-एसटी मामलों में एफआईआर दर्ज कराने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

Allahabad High Court important observation on filing FIR

Allahabad High Court's important observation on filing FIR

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) वर्ग के पीड़ित की अर्जी पर जरूरी नहीं है कि विशेष अदालत अथवा मजिस्ट्रेट एफआइआर दर्ज करने का ही निर्देश दें।

कोर्ट को पहले आरोपों का मूल्यांकन करना चाहिए और फिर तय करना चाहिए कि पुलिस से विवेचना करानी है अथवा कंप्लेंट केस दर्ज कर केस आगे बढ़ाना है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ ने आजमगढ़ निवासी कुसुम कनौजिया की आपराधिक अपील खारिज कर दी।

कोर्ट ने कहा, एससी-एसटी एक्ट की धारा चार नियम पांच पुलिस अधिकारियों को एफआइआर दर्ज कर जांच करने का निर्देश देते हैं, लेकिन इससे विशेष अदालत का न्यायिक विवेकाधिकार कम नहीं होता।

अपीलार्थी ने पवन चौबे तथा चार अन्य के खिलाफ बरदह थाने में दर्ज कराए गए मामले में विशेष न्यायाधीश (एससीएसटी अधिनियम) के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसका आवेदन 19 जनवरी 2026 को खारिज कर दिया गया था।

राज्य सरकार के वकील ने ये कहा-

राज्य सरकार के वकील का कहना था कि एससी-एसटी एक्ट में स्पेशल कोर्ट पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि वह आवेदन पर जांच न कर सके। कोर्ट ने दो बिंदुओं का परिशीलन किया। पहला, क्या स्पेशल कोर्ट को एससी-एसटी एक्ट के तहत आवेदन पर जांच का अधिकार है? दूसरा ट्रायल कोर्ट का निर्णय सही है अथवा गलत?

इलाहाबाद हाई कोर्ट के आशा बनाम उत्तर प्रदेश मामले में दिए गए निर्णय का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा, मजिस्ट्रेट ने आवेदन पर जांच कर अपनी सीमा का उल्लंघन किया है, जो एससी/एसटी एक्ट के तहत निषिद्ध है। इस एक्ट की धारा 4 और नियम 5 के अनुसार पुलिस अधिकारी को एफआइआर दर्ज करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया।

इसके बजाय मजिस्ट्रेट ने खुद ही जांच की जो गलत है। इस संबंध में कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट की धारा 18-ए का हवाला दिया, जो कहती है कि स्पेशल कोर्ट को इस तरह की जांच करने का अधिकार नहीं है।

अपीलार्थी के अधिवक्ता का कहना था कि बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) 2023 की धारा 173(4) के तहत दायर आवेदन अधीनस्थ अदालत ने गलत तरीके से खारिज कर दिया। एफआइआर दर्ज करने का निर्देश देने के बजाय आरोपों की स्वयं जांच की, जबकि यह स्थापित कानून है कि विशेष न्यायालय को ऐसे आवेदन पर विचार करते समय ऐसी जांच करने का अधिकार नहीं है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4 और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम, 1995 के नियम 5 न्यायालय को भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173(4) के तहत दायर आवेदन पर जांच करने से रोकते हैं।