अक्षय तृतीया विशेष: भगवान ऋषभदेव के पारणे से शुरू हुई परंपरा, आहारदान क्यों है सर्वश्रेष्ठ दान

अक्षय तृतीया विशेष: भगवान ऋषभदेव के पारणे से शुरू हुई परंपरा, आहारदान क्यों है सर्वश्रेष्ठ दान

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Akshaya Tritiya Special

चंडीगढ़: Akshaya Tritiya Special: वैशाख शुक्ल तृतीया यानी अक्षय तृतीया को सनातन और जैन धर्म में अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन बिना पंचांग देखे विवाह, गृह प्रवेश और नए व्यापार जैसे शुभ कार्य शुरू किए जाते हैं। इस तिथि का सीधा संबंध जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव यानी आदिनाथ से है।

छह माह बाद हुआ था पारणा:  
कथा के अनुसार, भगवान आदिनाथ ने एक वर्ष का निराहार तप किया था। तप के बाद आहारचर्या के लिए जब वे ग्राम-नगर में निकले तो छह महीने तक उन्हें विधिपूर्वक आहार नहीं मिला। विहार करते-करते वे हस्तिनापुर पहुंचे। 

वहां के राजा सोमप्रभ और उनके भाई राजकुमार श्रेयांस ने भगवान के दर्शन किए। भगवान को देखते ही राजकुमार श्रेयांस को जातिस्मरण हो गया और उन्हें पूर्व भवों में मुनियों को आहार देने की विधि याद आ गई।

गन्ने के रस से हुआ पारणा:  
श्रेयांस ने भगवान की तीन परिक्रमा कर उन्हें उच्च आसन पर विराजमान किया। चरण प्रक्षालन और अष्ट द्रव्य से पूजन के बाद उन्होंने मन-वचन-काया की शुद्धि का निवेदन कर प्रासुक इक्षुरस यानी गन्ने के रस का आहार कराया। भगवान ने खड़े होकर अंजुली बनाकर राजकुमार श्रेयांस, राजा सोमप्रभ और रानी लक्ष्मीमति से आहार ग्रहण किया।

देवों ने की रत्नवर्षा:  
मान्यता है कि आहार ग्रहण करते ही आकाश में देवों का समूह एकत्र हो गया। रत्नों-मदार पुष्पों की वर्षा हुई, मंद सुगंधित पवन चली और दुंदुभी के साथ ‘अहोदानं महादान’ की ध्वनि गूंजी।

क्यों कहते हैं अक्षय तृतीया:  
जिस दिन भगवान का पारणा हुआ वह बैशाख सुदी तृतीया थी। शास्त्रों के अनुसार जहां तीर्थंकर का आहार होता है, वहां भोजनशाला की वस्तुएं अक्षय हो जाती हैं। इसी कारण यह तिथि ‘अक्षय तृतीया’ कहलाई। तभी से यह दिन इतना पवित्र माना गया कि आज भी सभी सम्प्रदाय के लोग इसे सर्वोत्तम मुहूर्त मानते हैं।

आहारदान है सर्वश्रेष्ठ:  
जैन शास्त्रों में दाता, दान, देय और पात्र के लक्षण समझकर सत्पात्र को दान देने वाले को मोक्ष का अधिकारी बताया गया है। आहार, औषधि, शास्त्र और अभय - इन चार दानों में आहारदान को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि शेष तीन दानों की पूर्ति भी आहार से ही संभव है। इसलिए अक्षय तृतीया पर सुपात्र को दान देकर इस परंपरा को बनाए रखने का संदेश दिया जाता है।

- सन्त कुमार जैन  
महामंत्री, श्री दिगम्बर जैन सोशाइटी, चण्डीगढ़  
जैन मिलन, चण्डीगढ़