14 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म मामले में साक्ष्यों के अभाव में आरोपी बरी
- By Gaurav --
- Friday, 06 Mar, 2026
Accused acquitted in 14-year-old kidnapping
चंडीगढ़ की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने 14 साल पुराने कथित किडनैपिंग और दुष्कर्म मामले में आरोपी संजय को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। यह फैसला अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश- कम-फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की जज डॉ. याशिका ने सुनाया।
आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 366, 369 और 376 के तहत मामला दर्ज किया गया था, जो 2024 तक पीओ भी रहा l पुलिस थाना सेक्टर-36 में दर्ज एफआईआर के अनुसार घटना 12 सितंबर 2012 की बताई गई थी। शिकायतकर्ता, जो पीड़िता का पिता है, ने पुलिस को दी शिकायत में कहा था कि उसकी बेटी 12 सितंबर की सुबह स्कूल जाने के बाद लापता हो गई थी। उसने संदेह जताया था कि उसे नेहरू कॉलोनी, सेक्टर-53 निवासी संजय ने अगवा किया है।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार लड़की को 14 सितंबर 2012 को बरामद किया गया, जिसके बाद उसके बयान के आधार पर 17 सितंबर 2012 को आरोपी के खिलाफ अपहरण और दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि धमकियों के कारण 14 सितंबर को मेडिकल जांच नहीं कराई जा सकी।
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से एडवोकेट मंदीप कुमार और कशिश जैन ने बचाव पक्ष की पैरवी करते हुए प्रॉसिक्यूशन की कहानी में कई विरोधाभास और सबूतों की कमी को उजागर किया।
एडवोकेट मंदीप कुमार ने अदालत को बताया कि शिकायत में कहा गया है कि पीड़िता का 12 सितंबर 2012 को अपहरण हुआ, जबकि बचाव पक्ष द्वारा पेश स्कूल की उपस्थिति रजिस्टर के अनुसार उस दिन पीड़िता स्कूल में मौजूद थी। इसे आरोपों में बड़ा विरोधाभास बताया गया। उन्होंने आगे तर्क दिया कि रिकॉर्ड में पेश किए गए पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता की 14.09.2012 को धमकी के कारण मेडिकल जांच नहीं की जा सकी, जिसका अर्थ है कि पुलिस रिपोर्ट 14.09.2012 को पीड़िता की बरामदगी पर भरोसा करती है लेकिन जांच अधिकारी ने अपने बयान में कहा कि अपहरण 14.09.2012 को किया गया था। यहां यह बताना उचित है कि मंदीप कुमार ने तर्क दिया कि साक्ष्य रिकॉर्ड में अंतर और कोई भी संबंधित बयान पेश नहीं किया जाना इस झूठे मामले में आरोपियों को फंसाने को दर्शाता है।
वहीं एडवोकेट कशिश जैन ने तर्क दिया कि पुलिस जांच में गंभीर खामियां हैं। पीड़िता की कथित बरामदगी के स्थान, तारीख और समय की पुष्टि के लिए कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया। इसके अलावा एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी का भी संतोषजनक स्पष्टीकरण रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता की गवाही बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों से मेल नहीं खाती और एफआईआर में देरी का भी उचित कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।
इन परिस्थितियों में अदालत ने आरोपी संजय को सभी आरोपों से बरी कर दिया।