उत्तराखंड दौरे पर राहुल गांधी, संगठन को एकजुट करने की बड़ी चुनौती
A Major Challenge to Unify the Organization
देहरादून। A Major Challenge to Unify the Organization, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का दो-दिवसीय उत्तराखंड दौरा तय हो गया है। वह चार जून को अल्मोड़ा में जनसभा और इसी दिन पौड़ी में पूर्व सैनिक सम्मेलन को संबोधित करेंगे। अगले दिन पांच जून को वह देहरादून में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्यों, विधायकों, पूर्व विधायकों और कांग्रेस के आनुषंगिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करेंगे।
उनका दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब प्रदेश कांग्रेस अंतर्कलह, आपसी खींचतान व धड़ेबाजी से जूझ रही है। ऐसे में उनके दौरे को सांगठनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी से तय होगा कि अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस कितना खम ठोककर उतरेगी।
चार जून को अल्मोड़ा में जनसभा और पौड़ी में पूर्व सैनिक सम्मेलन को करेंगे संबोधित
उत्तराखंड में सत्ताधारी दल भाजपा विधानसभा चुनाव में हैट-ट्रिक लगाने के उद्देश्य से मैदान में उतर चुका है। इस क्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे दिग्गज यहां चुनावी हुंकार भर चुके हैं। अब कांग्रेस भी राहुल गांधी के दौरे से पलटवार करने जा रही है।
राज्य में वर्ष 2017 से सत्ता से दूर चल रही कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल के दौरे से समीकरण बदलेंगे। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने राहुल गांधी के दौरे की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि उनके कार्यक्रमों के दृष्टिगत एक-दो दिन में पार्टी नेताओं को जिम्मेदारियां सौंप दी जाएगी।
पांच जून को देहरादून में होने वाली बैठकों में सांगठनिक कील-कांटे करेंगे दुरुस्त
सियासी गलियारों में राहुल गांधी के दौरे को भाजपाई दिग्गजों का जवाब देने के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन कांग्रेस में धड़ेबाजी, अंदरूनी खींचतान, संशय व अविश्वास के बादल अभी छंटे नहीं हैं। कांग्रेस में हाल में हुए घटनाक्रमों को इससे जोड़कर देखा जा रहा है। अब जबकि, कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी उत्तराखंड आ रहे हैं तो ऐसे में प्रदेश कांग्रेस के सामने आपस में सामंजस्य और एक सुरताल में एकजुट होने की चुनौती है। इसके लिए उसके सामने मात्र एक सप्ताह का समय ही है।
राहुल का यह दौरा ही तय करेगा कि आगामी विस चुनाव में कांग्रेस कितना खम ठोक पाएगी
यह भी सवाल है कि राहुल गांधी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोदियाल के हाथ में कितनी ताकत सौंपकर जाते हैं। कारण यह कि सात माह का समय गुजरने के बावजूद अभी तक उनकी टीम को पार्टी हाईकमान से हरी झंडी नहीं मिल पाई है। यद्यपि, पार्टी ने चतुर्भुज नेतृत्व दिया है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष को तो कमान देनी ही होगी।
देखना होगा कि गोदियाल को कितनी छूट मिलती है और उनकी ताकत में इजाफा होता है या नहीं, इस पर सबकी नजर रहेगी। इसके साथ ही कांग्रेस संगठन को एकजुट करने का टास्क भी राहुल गांधी के समक्ष होगा। यह समझना होगा कि जब कांग्रेस एक लाइन में लयबद्ध होगी, तभी वह चुनावी मोड में आ पाएगी।