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गुजरात में पूर्वोत्तर के लोगों पर हमले क्यों

मुंबई में अक्सर ऐसी घटनाएं घटती हैं, जब उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के उत्पीडऩ के मामले सामने आते हैं, हालांकि इस बार गुजरात से ऐसी खबरें आ रही हैं। दरअसल, साबरकांठा जिले में बीते सप्ताह एक बच्ची से बलात्कार के मामले में आरोपी की गिरफ्तारी के बाद बीते दो-तीन दिनों में माहौल खराब हो गया है, यहां कई इलाकों में बसे बिहार-यूपी के लोगों को निशाना बनाया गया। हैरानी की बात है कि कांग्रेस नेताओं पर इसके आरोप लग रहे हैं। इसके बाद मसले पर राजनीतिक सियासत शुरू हो चुकी है। राज्य में अराजक तत्व बिहार-यूपी के प्रवासियों को ढूंढ़-ढूंढ़कर निशाना बना रहे हैं।

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि डरे-सहमे लोग पलायन करने लगे हैं। गांधीनगर, अहमदाबाद, मेहसाणा, पाटन व साबरकांठा जैसे इलाकों से लोग काम-काज छोड़कर परिवार के साथ पलायन कर रहे हैं। उत्तर भारतीयों पर हमले में बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां भी हुईंए इसके बावजूद लंबे समय से वहां रहकर रोजगार या नौकरी कर रहे उत्तर भारतीय लोगों में भय का माहौल है। जाहिर है, भीड़तंत्र एक बार फिर हावी है।
वास्तव में यह सब एक 14 माह की बच्ची से बलात्कार के आरोप में बिहार के एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के साथ शुरू हुआ। सोशल मीडिया की सक्रियता ने ऐसे घृणास्पद संदेश फैलाए कि अचानक गैर गुजराती खासकर बिहार-यूपी के निवासी निशाने पर आ गए और उन्होंने वहां से बचकर भागना शुरू कर दिया। आरोप है कि पुलिस ने भी शिथिलता बरती और सच्चाई ढकने के लिए त्योहारी सीजन में लोगों के घर जाने का शिगूफा भी छोड़ाए जिसने असुरक्षा-बोध को और बढ़ाया। हालांकि जल्द ही हकीकत स्वीकार कर गैर-गुजरातियों की रिहाइश वाले इलाकों और उन कारखानों की सुरक्षा बढ़ा दी गई, जहां ये काम करते हैं। प्रशासन अब भले ही कह रहा हो कि सख्ती के बाद पलायन रुक गया है, लेकिन यह सब अपने आप में कई बड़े सवाल छोड़ गया है।

बलात्कार जघन्य और निंदनीय कृत्य है, और इसके दोषी को किसी तरह बख्शा नहीं जाना चाहिए। कानून को आरोपी को ही काबू कर उसे सजा देनी चाहिए। इसमें बाकियों का क्या दोष हो सकता है। किन्हीं राज्य-विशेष से जोड़कर मसले को देखना उचित नहीं। एक जघन्य घटना के तौर पर न देख, अगर इसे यूपी-बिहार की मानसिकता माना जा रहा है, तो यह विकसित, समझदार और मॉडल के तौर पर पेश किए जाने वाले गुजरात के लिए समझदारी भरी बात नहीं होगी। भारत विविधता में ही फले-फूलेगा और यही हमारी उपलब्धि है। भूलना नहीं चाहिए कि गुजरात की विकास यात्रा में बिहार-यूपी से जाने वाले मजदूरों का कम योगदान नहीं है।

गुजरात में इन दिनों जो लोग घृणा फैला रहे हैं, वे गुजरात के हितैषी नहीं कहे जा सकते। यह गुजरात के राजनीतिक नेतृत्व की ओर से निर्णायक हस्तक्षेप का समय है ताकि हिंसा फैलाने वालों पर सख्ती हो और पलायन करने वालों को संदेश मिले कि सरकार उनके साथ है। गांधी जयंती के 150वें वर्ष में उनके गृह प्रदेश में भाईचारा बना रहे, यह सुनिश्चित करना वहां की सरकार का पहला काम है। बदल चुकी आर्थिक व्यवस्था में अब राज्यों को बांट कर नहीं देखा जा सकता। रोजगार के लिए एक-प्रदेश से दूसरे में लोग जाएंगे ही, अगर वहां जाकर कोई अपराध घटता है तो आरोपी को ही सजा मिलनी चाहिए। जाहिर है, गुजरात के लोग इस बात को समझेंगे और इसके अनुरूप बर्ताव करेंगे।

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