Home » Photo Feature » दिवाली पर क्यों दी जाती है उल्लू की बलि? जानकर हो जाएंगे हैरान

दिवाली पर क्यों दी जाती है उल्लू की बलि? जानकर हो जाएंगे हैरान

उल्लू एक ऐसा पक्षी है जिसे मांस खाने वाले भी नहीं मारते हैं, क्योंकि इसे शकुन-अपशकुन से जोड़कर देखा जाता है। रात के समय उल्लू का बोलना अपशकुन और दुर्भाग्य भरा माना जाता है। कहा जाता है कि महमूद गजनी (971 – 1030) के क्रूर आक्रमणों और अत्याचारों को देखते हुए एक दिन उनके एक बेहद अक्लमंद मंत्री ने सोचा कि क्यों न सुल्तान को ये समझाने की कोशिश की जाए कि वो क्या कर रहे हैं।

वो एक रात उन्हें अपने साथ घने जंगलों की सैर पर लेकर गए। जंगल में लगभग सूख चुके एक पेड़ पर दो उल्लू बैठे थे। चांद की मद्धम रौशनी थी। सुल्तान ने मंत्री से पूछा कि ये दोनों आपस में क्या बात कर रहे हैं? मंत्री ने कहा कि सुल्तान, एक उल्लू दूसरे उल्लू से अपनी संतान की शादी की बात कर रहा है। दूसरा उल्लू जानना चाहता है कि दहेज में उसे कितने निर्जन गांव मिलेंगे?

सुल्तान ने पूछा, ‘तो दूसरे उल्लू ने क्या जवाब दिया?’ मंत्री ने कहा कि उल्लू कह रहा है कि जब तक सुल्तान जिंदा है, निर्जन गांवों की कोई कमी नहीं है। बताते हैं कि मंत्री की इस बात का सुल्तान पर बहुत गहरा असर हुआ और उन्होंने अपनी तलवार म्यान में डाल दी।उल्लू को एक ओर जहां बहुत से लोग मूर्ख मानते हैं, वहीं बहुत से लोगों के लिए वो एक समझदार पक्षी है। जो लोग मांसाहारी हैं, वो भी कभी उल्लू का मांस खाने के बारे में नहीं सोचते, लेकिन दिवाली आते ही उल्लुओं की बलि का बिगुल बज उठता है।

आप मानिए या न मानिए लेकिन काली पूजा के लिए आज भी उल्लुओं की बलि दी जाती है। इस दौरान उल्लुओं की ऊंची कीमत लगती है। तीस हजार का एक उल्लू। दिल्ली में तो बहुत से दुकानदार ऐसे भी मिल जाएंगे जो एक उल्लू को पचास हजार में बेचने की कसम खाकर दुकान में खड़े होते हैं, जबकि खुद उन्होंने उस उल्लू को जयपुर या मेरठ जैसी जगहों से महज तीन सौ या चार सौ में खरीदा होता है।तीन सौ के उल्लू की कीमत तीस हजार होने के पीछे एकमात्र कारण अंधविश्वास है।

ऐसी मान्यता है कि लक्ष्मी पूजा की रात उल्लू की बलि देने से अगले साल तक के लिए धन-धान्य, सुख-संपदा बनी रहती है। उल्लुओं की खरीद और बिक्री का ज्यादातर बाजार राजस्थान और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है, जहां ‘कलंदर’ उन्हें पकड़ते हैं। ये लोग मुख्य तौर पर जयपुर, भरतपुर, अलवर और फतेहपुर सिकरी के अंदरूनी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। कोराई-करावली गांव उल्लू के गुप्त व्यापार के लिए देशभर में कुख्यात हैं। मथुरा के पास कोसी-कलां भी इसके लिए जाना जाता है।

कुछ आदिवासी, मुख्य तौर पर बहेलिया लोग छोटे उल्लुओं को पकड़ते हैं और उनका प्रजनन कराते हैं ताकि दिवाली के मौके पर उन्हें ऊंचे दामों पर बेचा जा सके। उस वक्त पकड़ा गया एक नन्हा उल्लू बेचे जाने तक बड़ा हो चुका होता है। उल्लू के शरीर के हर हिस्से की अपनी कीमत होती है। चाहे वो चोंच हो, उसके पंजे हों, उसकी खोपड़ी हो, आंख हो चाहे उसका मांस। उसके शरीर के हर हिस्से का इस्तेमाल तांत्रिक पूजा के लिए किया जाता है।

Check Also

अंबाला हिसार नेशनल हाईवे पर हुआ दिल दहला देने वाला हादसा

हरियाणा:- अंबाला हिसार नेशनल हाईवे पर बस के पलट जाने का हादसा सामने आया है। …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Share
See our YouTube Channel