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सदन की समयावधि में वृद्धि स्वागतयोग्य प्रयास

हरियाणा विधानसभा की ओर से विधायकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम वक्त की जरूरत और माननीयों की बदलती भूमिका को और बेहतर बनाने का सराहनीय प्रयास है। इस कार्यक्रम में लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला समेत पक्ष-विपक्ष के नेताओं ने अपने अनुभव सांझा किये। मनोहर सरकार द्वारा अगले 5 वर्ष के दौरान 100 से ज्यादा बैठकों का लक्ष्य तय कर दिया है। यह निश्चय ही सराहनीय कदम है और इससे विधायकों को बोलने के लिए ज्यादा समय मिलेगा। लेकिन सदन की समय अवधि बढ़ाये जाने पर भी अगर हंगामों और वाकआउट का सिलसिला जारी रहा तो इस निर्णय का उद्देश्य ही विफल होकर रह जायेगा। इस अवधि में अगर ठोस कार्य निपटाए जाएं तब ही इसे फायदेमंद कहा जा सकता है, यह सदन के अध्यक्ष पर निर्भर है कि वह सरकर की भावनाओं को अमल में कैसे लाएं। सदन में बजट पेश होने से पहले विधानसभा में प्री-बजट चर्चा करने का प्रचलनशुरू करने के फैसले के लिए भी भाजपा सर्कार को साधुवाद दिया जाना चाहिए। यह अपने आप में एक नवीन विचार का प्रतिपादन होगा।

आशा की जनि चाहिए कि इस चर्चा में पक्ष-विपक्ष के विधायक जोतर्कपूर्ण सुझाव रखेंगे सरकार उन्हें बजट में शामिल करेगी। अभी तक यही होता आया है कि वित्तमंत्री किन्हीं विशेष वर्ग के लोगों या अपनी ही पार्टी के नेताओं से सुझाव लेकर बजट पर काम करता है, हालांकि इस बार विधायकों के सुझाव लेकर और प्री-बजट चर्चा पर निर्णय लेकर सरकार ने सराहनीय प्रयास किया है। वास्तव में अब महज औपचारिकतायें पूरी करने का वक्त नहीं रह गया. नए दौर में आवश्यकता इस बात हो गई है कि उन कार्यों और योजनाओं का लाभ हकीकत में संबंधित वर्गों और लोगों तक पहुंचना सुनिश्चित कैसे करें। विधायकों से सुझाव लेते हुए संभव है उद्योग, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा आदि के संबंध में ऐसे विचार सामने आएं जोकि अभी तक अप्रत्यक्ष थे। वैसे भी सरकार होने का अभिप्राय बंद कमरों में बैठकर योजनाएं बनाना नहीं रह गया है, सरकार को सड़क पर उतर कर हालात को समझना ही होगा, तभी वह लोककल्याणकारी बन पाएगी। हरियाणा सरकार की एक खास बात यह भी है कि यहां वित्त विभाग मुख्यमंत्री के पास ही है।

हरियाणा विधानसभा के अंदर से ही इसकी प्रतिध्वनि भी सुनाई दे रही है कि लोकसभा और विधानसभा के पीठासीन अधिकारियों की शक्तियों को कम किया जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने विधायकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में ही इसका खुलासा किया है कि सभी विधानसभाओं और लोकसभा के नियम भी एक जैसे बनाने की कोशिश है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने संसद से 10वीं अनुसूची में संशोधन करके ऐसे प्रावधान बनाने को कहा है, जिससे किसी सांसद या विधायक के दलबदल का दोषी होने या न होने का फैसला स्पीकर की जगह एक ट्रिब्यूनल से करवाया जाएगा। दरअसल, स्पीकर्स पर आरोप लगता रहता है कि वे अपने मूल दलों के प्रति रुझान रखते हुए पक्षपात करते हैं, जिससे दलबदल विरोधी कानून भी कमजोर पड़ रहा है। लोकसभा स्पीकर बिड़ला का बयान भी अगर इसी संदर्भ में देखा जाए तो यह भी सार्थक कदम ही बताया जाना चाहिए। आखिर राजनीतिक शूचिता कायम करना विधानपालिका का ही कार्य है और न्यायपालिका अगर इसका सुझाव रख रही है तो इस पर काम होना चाहिए।

वास्तव में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का यह कथन स्वीकार्य और प्रेरक होना चाहिए कि सदन के अंदर स्वच्छ प्रतिस्पर्धा हो, संवाद और तर्क-वितर्क के जरिए अच्छा कानून बनाने का प्रयास हो। वहीं जनता का भरोसा, विश्वास और उसकी आकांक्षाओं पर भी निवार्चित प्रतिनिधियों को खरा उतरना चाहिए। विधायकों को बोलने के लिए ज्यादा समय देने की जरूरत पर भी उन्होंने बल दिया और कहा कि सदन में ज्यादा से ज्यादा समय चर्चाएं होनी चाहिए। यह समझने वाली बात है कि अगर समय ही कम होगा तो चर्चा कैसे होगी। दरअसल, यह कार्यक्रम सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की खाई को दूर करने के लिए भी एक अवसर बनकर आया है।

मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जहां विधायकों की बैठकों का समय बढ़ाने की बात सामने रखी वहीं नेता विपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी यह स्वीकार किया कि इस कार्यक्रम से नए विधायकों को काफी कुछ सीखने को मिला है। उन्होंने एक विशेष टिप्पणी भी कि जिसकी जरूरत आज भारतीय राजनीति को बेहद है। हुड्डा ने कहा कि हम पक्ष-विपक्ष भले ही रहें लेकिन देश के लिए हमेशा एकजुट हैं। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम सिर्फ नए विधायकों के लिए ही नहीं है अपितु सभी विधायकों के लिए आवश्यक हैं। बेशक, माननीय ही नीति नियंता हैं लेकिन अपने संबंध में ही अगर वे नया सीखने का नियम बना लेते हैं, तो यह स्वागतयोग्य है। जनता से मिलने, उनकी समस्याओं का आकलन करने, अधिकारियों के साथ कार्य व्यवहार और कार्यक्रमों, योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए विधायकों का नियमित प्रशिक्षण जनता के हित में ही होगा। इसके अलावा माननीयों की खुद की छवि भी निखरेगी।

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