Wednesday, September 18, 2019
Breaking News
Home » धर्म / संस्कृति » गलत का जवाब गलत से देना सही नहीं ठहराया जा सकता : मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक

गलत का जवाब गलत से देना सही नहीं ठहराया जा सकता : मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक

गलतफहमी किसी कांटे की तरह होती है चाहे वह चरित्र पर शक करना और जब वह आपके रिश्ते में चुभन पैदा करने लगती है, ये सब चरित्रहीनता के लक्षण होते है। चरित्रहीन कभी भी अपना विकराल रूप धारण कर सकती है ओर इसकी निशानियां रिश्तो मे भी छलकनी लगती है। यही कारण है कभी फूल लगनेवाला रिश्ता आपको खरोंचे देने लगता है।

जो जोड़ा कभी एक-दूसरे पर जान छिडक़ता था, एक-दूसरे की बांहों में जिसे सुकून मिलता था और जो साथी की ख़ुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था, वो जब ग़लतफ़हमी का शिकार होने लगता है, तो रिश्ते की मधुरता व प्यार को नफऱत में बदलते देर नहीं लगती। ऐसे में अपने रिश्तें को टूटने से बचाने के लिए कुछ ऐसा करे। यह बात सही है कि बात करने के दौरान आपको कुछ ऐसा सुनने के लिए भी मिल सकता है जो आपको अच्छा ना लगे, पर आपको समस्या का समाधान करना है और इससे अच्छा तरीका कुछ भी नहीं है। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 18सी गोयल भवन 1051 में सभा को संबोधित करते हुए कहे।

मनीषी संत ने अंत मे फरमाया वह औरत हमेशा से ही सीधे और सरल व्यवहार की थी। उसमें चालाकी और दुव्र्यवहार जैसे अवगुण नहीं थे। लेकिन कुछ समय बाद उसे अपने पति पर संदेह हो गया। संदेह यह कि उसका पति कुछ तो ऐसा कर रहा है, जिसे उसे छिपाना पड़ रहा है। उसने अपने पति पर नजर रखनी शुरू कर दी। उसे घेरने के लिए चालाकी भरे हथकंडे अपनाने लगी। उसने जाल बिछाना और झूठे तरीकों का इस्तेमाल करके अपने पति को रंगे हाथ पकडऩे की कोशिश शुरू कर दी।

अब जरा ठहर जाइए। सोचिए, हो सकता है कि उसका पति वाकई किसी गलत रास्ते पर हो, लेकिन पत्नी ने क्यों अपने सही कदमों को गलत रास्ते पर रख दिया? जो उसके व्यवहार का हिस्सा नहीं है, उसे क्यों अपना लिया? कई बार हम बुराई से लड़ते-लड़ते अपने आप में ही बुराई पैदा कर लेते हैं। हम शत्रुओं को इतने ध्यान से देखते हैं कि उनके ज्यादातर अवगुण हममें ही आ जाते हैं। शत्रु से निपटने में हम भी शत्रु जैसे ही हो जाते हैं।

जब कभी आप किसी की गलती की तरफ उंगली उठाइए और खुद से रटा-रटाया जवाब मिले कि, ‘मैं ऐसा क्या कर रहा हूं, जो बाकी दुनिया नहीं कर रही है तो समझ लीजिए कभी भी संसार की दुर्बलताओं का बहाना लेकर अपनी दुर्बलताओं पर झीना सा भी पर्दा नही डाल पाएंगे। दुर्योधन से निपटने के लिए अर्जुन बनना होगा न कि दुर्योधन। एक सेमिनार में बोलने के बाद एक बच्चे ने पूछा कि जब लोग हमारे साथ अभद्रता करें तो हम उनकी प्रशंसा क्यों करें? इसका जवाब था कि प्रशंसा करना मेरा चरित्र है और अभद्रता करना उसका चरित्र। उसके चरित्र को मैं अपने चरित्र पर नहीं लाद सकता। हमें उनके साथ भी सभ्य बने रहना होगा, जो हमारे साथ सभ्य नही हैं।

किसी के ओछेपन से अपने चरित्र को ओछेपन तक लाना तो बेवकूफी ही है। इतना तो मानना ही होगा कि क्रोध की प्रतिक्रिया में किया गया क्रोध, उससे भी बड़ा क्रोध है। बुराई की प्रतिक्रिया में की गई बुराई उससे भी बड़ी बुराई है। गलत की प्रतिक्रिया में किया गया गलत काम किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता। जीवन में दो नकारात्मकताएं मिलकर एक सकारात्मकता नहीं बन सकती।

Check Also

वाराणसी में 12 नवम्बर को विश्वप्रसिद्ध ‘देव दीपावली’

वाराणसी। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में नवम्बर माह में आठ से 11 तक ‘काशी गंगा …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Share
See our YouTube Channel