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युद्ध के परिणाम पूरी मानव जाति के लिए हानिकारक हुआ करते हैं

युद्ध के परिणाम पूरी मानव जाति के लिए हानिकारक हुआ करते हैं

war are harmful: भक्तजनों का जीवन महान रहा है। उन्होंने महान देन दी है। आज उसी की जरुरत हर इन्सान को है ताकि सभी इस निरंकार प्रभु के साथ अपना नाता जोडक़र इन्सानियत के प्रति आस्थावान हो सकें। एक मानवता का रुतबा बुलन्द कर सकें। हमेशा ऐसे प्रयास कर सकें जिसमें अपनी भी भलाई हो और दूसरों की भी भलाई हो।

war are harmful: इन जब इस सत्य से दूर निकल जाता है तो अच्छाइयों से दूर निकल जाता है। हम देखते हैं कि इससे इन्सान ऐसा रुप धारण कर लेता जो हानिकारक होता है। जो अपने लिए और दूसरों के लिए भी दुख व बेचैनी का कारण बनता है। दातार प्रभु परमात्मा ने इन्सान को उतम जन्म दिया, सोचने-समझने की ताकत दी, लेकिन सभी योनियों से श्रेष्ठ होकर भी इसने राह अपनाई नादानी वाली। इसने अविवेक से काम लिया और दातार की दी हुई सभी सामर्थाओं को लालसा से भरपूर होकर इस्तेमाल किया।

स्वार्थपरता तथा स्वार्थलिप्सा के साथ तंग दायरों में बंध कर इनका इस्तेमाल किया। उसके नतीज में हमने देखा कि उसके कारण जुल्मों-सितम भी हुए और अभी भी हो रहे हैं। घरों को उजाडऩे का काम होता हुआ हम देख रहे हैं। इस प्रकार इन्सान ने प्रभु की दी हुइ सामर्थाओं का दुरुपयोग किया है और इसने दूसरों की भलाई की अपेक्षा दूसरों के नुकसान का अधिक सोचा है। इसलिए महापुरुषों-सन्तजनों ने यही पैगाम दिया, यही आवाज़ दी कि इन्सान! तू अपने लिए जीता रहता है।

अपनी लालसाओं की पूर्ति की ही तुझे फिक्र रहती है। तू भूल जाता है कि तू अकेला ही इस संसार में नहीं है, तेरे उत्तरदायित्व का फैलाव बहुत अधिक है। तू इस धरती का बाशिंदा है। प्रभु-परमात्मा के मानव परिवार का अंश है। तेरे उत्तरदायित्व कहीं आगे बढ़ जाते हैं। उनकी अनदेखी जरुर हुई। अनदेखी के कारण तूने ऐसे कार्य किये हैं जो नुकसान वाले कार्य हैं। जब अपनी लालसा की पूर्ति में लगा रहता है तो बड़े से बड़े उपदेव हो जाते हैं। बड़े से बड़े उपद्रव करा दिए जात हैं।

किसी ने कहा है कि युद्ध हुआ करते हैं। युद्ध का कारण क्या है? तो कहने वाला कहता है कि युद्ध के कारण नहीं हुआ करते, युद्ध के तो परिणाम हुआ करते हैं। कारण तो कोई भी हो सकता है। हम अक्सर इन्हीं मुल्कों में ऐसी आवाज सुनते हैं कि घरेलू समस्याएं हैं तो कोई युद्ध छेड़ दिया। यह अक्सर हम पढ़ते हैं, सुनते हैं। तो कारण तो कोई विशेष नजऱ नहीं आता। कारण समझ में आये या न आये लेकिन परिणाम तो सभी को समझ आते हैं। ये एक जैसे ही हुआ करते हैं, कारण भले ही कोई भी हो उसमें हमें खुशी या हंसी नहीं मिलती है, उसमें हाहाकार ही मिलती है।

वहाँ हमें माता-बहनों के सिन्दूर मिटते हुए ही देाने को मिलते हैं। युद्ध के परिणाम पूरी मानव जाति के लिए हानिकारक हुआ करते हैं।
इसलिए महापुरुष कहते हैं कि इन्सान तू अपनी लालसा की तरफ ध्यान न दे। तू ध्यान दे तो दूसरों को सुख देने की तरफ, दूसरों के कल्याण की तरफ। ऐसे कार्यों में ही अपनी सामर्थ्य लगा। सोचने की ताकत तेरे पास है। तू ऐसी योजना बना जिससे कि सभी चैनसे सो सकें, आराम से जीवन जी सकें। अगर प्रभु ने तेरे तन को ताकत प्रदान की है तो उस ताकत को लगा दें, संवारने के लिए,डुबते हुए को उबारने के लिए, गिरे हुए को उठाने के लिए।

रोते हुए के आँसू पोंछने में इन हाथों का इस्तेमाल कर ले। डुबते हुए को किनारे लाने का काम कर ले। इन हाथों से किसी को धक्का देने का काम न ले। दातार प्रभु ने धन दिया है, इस धन का भी सदुपयोग कर। इस धन को भी लगा दे परोपकार में। इसे दूसरों की भलाई में लगा दे। इस प्रकार तू एक दूसरे को सुख और चैन देने वाला बन जाएगा। रसना दी है प्रभु-परमात्मा ने इससे भी मीठे बोल बोल ले, कीर्ति बढ़ाने वाले शब्दों का उच्चारण करले। महापुरुषों की वाणी का उच्चारण कर। इस जुबान से कहीं आग न लगा, इस जुबान से कहीं गहरे घाव न दे जो कि भर भी न पायें7 तो इस प्रकार दातार की दी हुई तमाम समर्थाओं का तूने सदुपयोग करना है। इसलिए महापुरुष कहते हैं कि इन्सान तुझे इस समर्थ के साथ जुडऩा होगा। महापुरुषें के अनुसार काम करना होगा। इस प्रकार विशालता का प्रमाण देने होगा।

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