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आत्मा को परमात्मा की प्यास होती है: निरंकारी बाबा

ईश्वर के ज्ञान की प्राप्ति के लिए जहां गुरु की आवश्यकता है, वहां जिज्ञासु की तीव्र जिज्ञासा भी जरुरी है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के अनुसार जिज्ञासा इतनी तीव्र होनी चाहिए, (जैसे) यदि कोई इन्सान डूब रहा हो पानी में, उसके श्वांस जा रहे हों, जिस तरह से उसको उस वक्त पानी से बाहर निकलने की इच्छा होती है, जिस तरह से उसकी एकाग्रता होती है कि मैं इस पानी से बाहर आ जाऊं और खाली सांस ले सकूं, मेरा मुख पानी से बाहर आ जाए। उसकी तड़प जो उस वक्त होती है, उसी तरह इन्सान की तड़प इस प्रभु दातार के लिए होनी चाहिए। इस भवसागर से पार उतरने की इच्छा होनी चाहिए।

आत्मा को परमात्मा की जो प्यास है, उस तरफ इन्सान कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन अगर शरीर को पानी की प्यास लगती है तो एक गली में पहुंचता है और कहता है कि बड़े जोरों से प्यास लगी है, भाई साहब, बताईए पानी कहां से मिलेगा? कोई बताता हे कि यह गली जहां आप हैं आगे दाहिने मुड़ती है, वहीं नल लगा हुआ है, वहां आपको पानी मिलेगा। इन्सान जाता है, नल खोलता है, एक बूंद भी नहीं निकलती। तब क्या वहीं पर ठहर जाता है? नहीं। फिर किसी से पुछता है, फिर कोई बताता है कि एक फर्लांग आगे चले जाओ, वहां पर भी नल लगा हुआ है, पानी मिल जाएगा।

वहां जाता है, पानी नहीं मिलता। तब भी क्या वह वहीं बैठ जाता है कि दो-तीन फर्लांग चल कर भी आ गया, मुझे तो यहां पानी नहीं मिला, मैं तो बस अब यहीं बैठता हूं। पयास उसके मन को तड़पाएगी और तब तक तड़पाएगी जब तक उसे पानी नहीं मिलेगा। चाहे उसको कोई भागने के लिए कहे, चाहे आंधी चल रही हो, पर उसे तो चलना है। क्योंकि पानी की तड़प है। इसी तरह से अगर इस हरि की तड़प मन में है तो इन्सान को जहां जाने को कहा जाता है, यदि वहां पर सन्तुष्टि नहीं होती तो आगे चलता है। अगर उस को हकीकत में आत्म साक्षात्कार नहीं कराया जाता कि ये अचल है, अमर है, अविनाशी है, कण-कण में व्याप्त है, हर जगह मौजूद है, प्रलय के साथ प्रलय नहीं होता, उत्पन्न के साथ उत्पन्न नहीं होता, जितने भी प्रभु के गुण बताए गए हैं, उस परमात्मा का अगर बोध नहीं होता, तो अवश्य इन्सान को ये प्रयत्न करते रहना चाहिए। लेकिन अगर वास्तव में इसकी प्यास इन्सानों को है तो इस कार्य को कभी कल पर नहीं छोड़ेंगे।

अगर अभी मुझे प्यास लगी है, अभी मुझे भूख लगी है तो क्या मैं कह दूंगा कि अभी मुझे समय नहीं है, मैं कल खा लूँगा। मैं परसो पानी पी लूंगा। नहीं। जिसे प्यास लगती है, भूख लगती है तो थोड़ा समय व्यतीत होते ही उसका गला सूखना शुरु हो जाता है। इसी तरह इन्सान को वास्तव में अगर परमात्मा की भूख और प्यास है तो वह हमेशा परमात्मा की तरफ कदम बढ़ाएगा, वह इसे कभी भुला नहीं देगा, कभी बिसार नहीं देगा।

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