दूसरों के प्रति अच्छे नहीं सच्चे बनें: मुनिश्री आलोक
Thursday, June 21, 2018
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दूसरों के प्रति अच्छे नहीं सच्चे बनें: मुनिश्री आलोक

दूसरों के प्रति अच्छे नहीं सच्चे बनें: मुनिश्री आलोक

चंडीगढ़: जीवन में ऐसा सभी के साथ होता है कि हमारे नजदीकी मित्रों, रिश्तेदारों या परिचितों को किसी खास मौके पर पैसों की जरूरत होती है और वे हमसे आर्थिक मदद की उ मीद करते हैं। उस वक्त हमारे पास उनकी मदद करने की क्षमता नहीं होती लेकिन हम उन्हें स्पष्ट मना नहीं कर पाते हैं। हम उन्हें कहते हैं, मैं एक-दो दिन में जवाब देता हूं। जिस क्षण हमसे पूछा जाता है कि क्या हम उनकी मदद कर पाएंगे उसी क्षण हमें अपनी स्थिति के बारे में पता होता है लेकिन हमने अपने प्रियजनों को अंधेरे और उजाले के बीच छोड़ देते हैं। अगली बार जब वे संपर्क करते हैं तो हम बचने की कोशिश करने लगते हैं। कई बार बहाने बनाने लगते हैं। इस तरह हम खुद के लिए अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं और दूसरे को भी झूठा भरोसा दिलाते हैं।

इस पूरी दुविधा की वजह यही है कि हम दूसरों की नजर में अच्छे बने रहना चाहते हैं। दूसरों की नजर में अच्छे बने रहने के कारण हम सच नहीं बोलते और अपने लिए मुश्किल स्थितियां पैदा कर लेते हैं। अच्छा बने रहने के कारण ही कुछ लोग द तरों में अपने तय काम से ज्यादा काम करते रहते हैं और तनावपूर्ण जीवन जीते हैं। ये शब्द मनीषी संतमुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 1051 गोयल भवन में रविवारिय सभा को संबोधित करते हुए कहे।

मनीषीश्रीसंत ने आगे कहा काम को जीवन के उतने ही हिस्से में रखें जितने में आप सहजतापूर्वक आगे बढ़ सकते हैं। इन दिनों हर क्षेत्र में हमसे यह उ मीद की जाती है कि तय लक्ष्यों को हम कुशलता से प्राप्त करें। आप ज्यादा अच्छे नतीजे दें इसकी चाह भी आपसे रहती है। लेकिन अच्छे परिणामों के लिए आपको स्पष्ट सोच के साथ किसी भी दिशा में आगे बढऩा होगा। विचारों की स्पष्टता के साथ आप लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं। कुछ लोग अपने समय का सदुपयोग करने में विशेषज्ञ होते हैं। वे अपने जीवन को सही दिशा में आगे बढ़ा पाते हैं। वे हर सप्ताह कम घंटे काम करते हुए भी ज्यादा लक्ष्य पूरे कर लेते हैं।

इसके लिए कुछ छोटी तरकीबें कारगर हो सकती हैं- अपने दिन की शुरूआत उस काम के साथ करें जिसे आप टालते रहते हैं। उन कामों के साथ जो आपके लिए अधिक कठिन होते हैं लेकिन अति महत्वपूर्ण भी। जब एक बार आप उनका सामना कर लेंगे तो आपको ज्यादा समय उनमें नहीं देना होगा। इसके अलावा कठिन चुनौती से निपट लेने पर आपका तनाव भी खत्म होगा। उपलब्ध संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग करना भी बेहतर नतीजे पाने के लिए जरूरी है। अक्सर बेहतर नतीजे पाते हुए आप उपलब्ध सभी संसाधनों की तरफ ध्यान नहीं देते हैं और इसलिए नतीजे मनचाहे नहीं मिल पाते। सभी संसाधनों का उपयोग करने की आदत आपके लिए फायदेमंद होगी। सुस्त न रहें और कुछ न कुछ नया काम हाथ में लें। अगर आप सुस्त हो गए तो उदासी आप पर हावी हो जाएगी। कुछ पढऩे के लिए समय निकालें। शुरुआत में पढऩे में मन लगाना पड़ेगा लेकिन कुछ समय बाद आपको इसमें आनंद आने लगेगा।

मनीषीश्रीसं ने अंत मे फरमाया अगर कोई व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश पाना चाहता है तो स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर उसे दो सवालों के जवाब देने होते हैं। अगर आपने इन दोनों सवालों के जवाब हां में नहीं दिए तो आपको स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। इसमें पहला सवाल है – क्या जीवन में आपने खुशी और आनंद का अनुभव किया है? और दूसरा सवाल है- क्या आपने अपने आस पास के लोगों को खुशी बांटी है? इन दोनों ही सवालों के लिए आपका जवाब अगर हां है तो मैं आपको यह बता दूं कि आप तो पहले से ही स्वर्ग में हैं। आपके अंदर से खुशी उमड़कर फूट रही थी, है न? पांच साल में आपका कद कितना था? अब आपकी लंबाई कितनी है? आपकी खुशी भी उसी अनुपात में बढऩी चाहिए थी न? बड़े होकर आप अपना अतीत ढोने लगे। जब आप अपने अतीत का बोझ लेकर चलते हैं, तो आपका चेहरा लटक जाता है, खुशी गायब हो जाती है, उत्साह खत्म हो जाता है।

मान लीजिए अगर आप पर किसी तरह कोई बोझ नहीं है तो आप बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह होते हैं। आप इतने साल के हैं या उतने साल के, इसका सीधा सा मतलब हुआ कि आप अपने साथ उतने सालों का कूड़ा ढो रहे होते हैं।मनीषीश्रीसंत ने अंत मे फ रमाया मासूमियत से भरी उस अबोध उम्र में आपने खुशी के सिवा और किसी भाव को नहीं जाना था। उसके बाद क्या हुआ? आप पलकर बड़े हुए। खुशी से रहने के लिए कई चीजों को ढूंढकर  किया। ऊंची पढ़ाई, क प्यूटर, अपना मकान, मोटर बाइक, गाड़ी, क्रेडिट कार्ड, टेलीविजन, डीवीडी, एसी, मोबाइल फोन वगैरह-वगैरह। इन कोशिशों के मुताबिक जाने कितनी सुविधाएं आपने जमा कर लीं? लेकिन क्या हुआ? खुशियां पाने के लिए जिंदगी में इतना सब कुछ पाने के बावजूद आपने सिर्फ खुशी को गंवा दिया। कहां गईं आपकी खुशियां? ऐसा इसलिए है कि आप सुख को ही खुशी समझ बैठे हैं, जबकि खुशी आपको अपने भीतर खोजनी है।

शायद बहुत सारी चीजों से प्रभावित होकर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि सच्चा आनंद क्या है? सच्चे आनंद और मिथ्या आनंद जैसी कोई चीज नहीं होती। जब आप वास्तव में सत्य के संपर्क में होते हैं, तब आप स्वाभाविक रूप से आनंद में होते हैं। अगर मैं सूर्यास्त को निहारते हुए आनंद का अनुभव करता हूं, तो क्या यह सच्चा आनंद है? यदि मैं प्रार्थना करते हुए आनंदित हो जाता हूं, तो क्या यह सच्चा आनंद है? जब मैं ध्यान करता हूं और आनंद का अनुभव करता हूं, तो क्या यह सच्चा आनंद है।

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