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लाॅकडाउन ने गिराये लहसुन के भाव

इटावा, 28 जून (वार्ता) व्यजंनो का स्वाद बढ़ाने के अलावा तमाम बीमारियों में आर्युवेदिक दवा के तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले लहसुन के दाम लाकडाउन के चलते औंधे मुंह आ गिरे है। बंपर पैदावार के बावजूद कोरोना वायरस के डर से लोगों के होटल,रेस्तरां में जाने से परहेज करने और शादी बारातों के टलने से कभी 21 हजार रुपये प्रति कुंतल बिकने वाला लहसुन आज थोक मंडियों में तीन हजार रूपये प्रति क्विंटल उपलब्ध है।

कृृषि अधिकारी अभिनंदन सिंह यादव ने रविवार को ‘यूनीवार्ता’ से कहा “ लाॅकडाउन से देश दुनिया में काफी कुछ बदला है और लहसुन के दाम भी इस संक्रमण काल में प्रभावित हुये हैं। रही बात दरों की उछाल की, तो मांग के अनुरूप दामों का घटना बढना तो होता ही है।”

पिछले वर्ष किसानों का बीस हजार रुपये कुंतल तक बिकने वाला लहसुन इन दिनो तीन हजार से छह हजार रूपए कुंतल पर अटक गया है जबकि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लहसुन की पैदावार भी कम हुई है। लाकडाउन के चलते बडे शहरो मे मांग कम होने से भाव मे उछाल नही आ पा रहा है। पिछले वर्ष लहसुन की फसल अप्रैल में मंडियों में पहुंची तो इसका भाव चार हजार से शुरू होकर 21 हजार रूपए कुंतल तक चढ़ गया था। व्यापारियों ने लाखो रूपए पैदा किए थे वही किसानो ने भी अपनी फसल का अच्छी कीमत पाई थी लेकिन इस बार लहसुन पर लाकडाउन का पूरा असर देखने को मिला है।

अप्रैल मे लहसुन का भाव ढाई हजार से शुरू हुआ था और अभी भी तीन हजार से छह हजार रुपये कुंतल के बीच चल रहा है । लाकडाउन की असमंजस को लेकर काम करने बाले व्यापारियों ने भी इस बार लहसुन से दूरी बना कर रखी है और स्टाक में लेने से बच रहे हैं।

इटावा जिले के ऊसराहार मे पिछले बीस वर्षों से लहसुन का व्यापक स्तर पर कारोबार होता है। क्षेत्र के किसानो की प्रमुख रूप से भी लहसुन की फसल रहती है हालांकि पिछले कुछ वर्षो से लहसुन की उपज मे लागत बढने से पैदावार का क्षेत्रफल काफी कम होता जा रहा है। जिले में करीब दस हजार हेक्टेयर लहसुन का रकबा है। हर वर्ष ही जिले में लहसुन की बंपर पैदावार होती है लेकिन इस वर्ष लहसुन की बंपर पैदावार किसानों को रूला रही है। राजस्थान, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में हुई लहसुन की बंपर पैदावार के कारण यहां के किसानों को अब खरीददार नहीं मिल रहे हैं । स्थिति यह है कि 10 से 15 हजार रुपये प्रति कुंतल तक बिकने वाला लहसुन इस वर्ष मात्र छह हजार रुपये प्रति कुंतल ही बिक रहा है ।

लहसुन के भाव में आई गिरावट का कारण यह भी है कि कोलकाता, नागपुर, रायपुर, हैदराबाद, कानपुर, रांची, अकोला, बिहार, दुर्गापुर जैसी मंडियों में इस बार यहां के लहसुन की डिमांड कम है। किसानों की माने तो अप्रैल माह में लहसुन का मूल्य तीन हजार प्रति कुंतल था। तब किसानों को भाव बढ़ने का इंतजार था।

ऊसराहार के लहसुन आढती प्रदीप कुमार बताते है कि इस बार लगभग बीस प्रतिशत क्षेत्रफल पिछले वर्ष की तुलना मे कम है लेकिन फिर भी किसानो को पिछली साल की तरह भाव नही मिल पा रहा है। मंडी मे किसान का छोटा (मीडियम) लहसुन तीन हजार रूपए कुतंल जबकि बीच का सायज (लाडवा) का भाव 5000 रूपए एवं सबसे उम्दा क्वालिटी (फूल) का भाव 6200 रूपए कुतंल के आसपास चल रहा है जबकि पिछले वर्ष किसानो का लहसुन ऊसराहार की मंडी मे 21 हजार रूपए कुतंल तक बिक गया था वहीं बड़े शहरो की मंडियों मे भाव 25 हजार तक चढ गया था।

ताखा के पुरैला गांव रहने बाले किसान तिलक सिंह यादव बताते है कि पिछली बार उनके खेतो मे 55 कुंतल लहसुन की पैदावार हुई थी। इस बार रकवा कुछ कम कर दिया है इस बार उनके पास मात्र 35 कुतंल ही लहसुन है। भाव अच्छा न मिलने के कारण अभी तक बेंचा नही है।

नगरिया खनाबांध के किसान राजकुमार बताते हैं कि पिछले वर्ष की तुलना में किसानो ने इस वर्ष 20 से 25 प्रतिशत कम क्षेत्रफल मे लहसुन की फसल की है लेकिन लाकडाउन के चलते फिर भी अच्छा भाव नही मिल पा रहा है

ताखा क्षेत्र के ऊसराहार की लहसुन मंडी में हजारों टन लहसुन का कारोबार होता है। यहां से लहसुन को खरीदकर व्यापारी कलकत्ता,मुंबई,बोकारो,नागपुर,दिल्ली,कानपुर,बनारस,हैदराबाद की थोक मंडियों मे भेजते है। लाॅकडाउन के दौरान सरकार के लाख निर्देशों के बाद भी तमाम खुदरा दुकानदारों ने ग्राहकों से औने-पौने दाम बसूलने मे कोई कसर नही छोड़ी है । कानपुर शहर मे आज भी सब्जी खरीदने बाले ग्राहकों को एक किलो लहसुन की कीमत 120 रुपए से लेकर 160 तक चुकानी पड रही है जबकि इटावा के ताखा तहसील के कस्बा ऊसराहार में लहसुन की आढतो पर किसानो का लहसुन 30 रूपए से 60 रूपए किलो मे बिक रहा है।

लहसुन किसानों पर भाव की मार दूसरी बार पड़ी है। बीते वर्ष भी लहसुन एक हजार रुपये कुंतल के आसपास बिका था। उस समय तो किसानों ने किसी तरह अपने आप को संभाल लिया। दूसरी बार फसल का ठीकठाक भाव न मिलने से किसानों की कमर पूरी तरह टूट गई है। लागत न निकलने से किसान सदमे में हैं।

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