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RSS की पत्रिका का 'tool' वाला आरोप क्या न्यायपालिका को अपमानित नहीं कर रहा?

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पांचजन्य पत्रिका ने सर्वोच्च अदालत पर की है गंभीर टिप्पणी

Panchajanya on SC : नई दिल्ली : बेशक यह आरोप कहीं जाकर सही हो सकता है कि भारत विरोधी ताकतें वह हर प्रयास करने में जुटी हैं, जिससे देश का बढ़ता सामर्थ्य रूक जाए। जिससे विश्व गुरु बनने की भारत की यात्रा कहीं ठहर जाए और वह उसी दौर में लौट जाए जब इसे सपेरों का देश बताया जाता था। पश्चिमी देशों की इस मानसिकता के खिलाफ भारत का यह संग्राम अनवरत जारी रहना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि क्या 'supreme court issuing notice to the centre on BBC documentary india: The Modi Question' सर्वोच्च न्यायालय पर ऐसे आक्षेप लगाए जा सकते हैं कि उसे भारत विरोधी तत्व औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं?

 

आखिर न्यायालय पूरी दुनिया के लिए होता है

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और पूरी दुनिया इसके लिए उसका सम्मान करती है। एक लोकतंत्र में प्रभावी न्यायपालिका का होना उसे और प्रबल बनाता है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को अपने देश के लोगों की भी सुननी होगी और विश्व की भी। तब यह कहना कि सर्वोच्च न्यायालय को कोई औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, बेहद आपत्तिजनक और अपमानित करने वाला भी है। ऐसी सोच को दंभी और सुपर पावर समझना भी कहा जा सकता है। दुनियाभर में न्यायपालिका का एक ही आदर्श होता है कि चाहे कोई किसी भी देश, धर्म, जाति, क्षेत्र से जुड़ा हो, उसे न्याय हासिल हो। बीबीसी की विवादित डॉक्यूमेंट्री इंडिया : द मोदी क्वेश्चन पर केंद्र सरकार के प्रतिबंध के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार करके क्या अपराध कर दिया कि उसके संबंध में कहा जा रहा है कि वह भारत विरोधी तत्वों के औजार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने पीएम मोदी को दी थी क्लीन चिट

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय जिस पर आज आरएसएस की पत्रिका पांचजन्य यह गंभीर आरोप लगा रही है, ने गुजरात दंगों के मामलों में वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देते हुए सख्त टिप्पणी की थी कि गुजरात दंगों के जरिए देश में विभाजनकारी राजनीति को जिंदा रखने की साजिश होती रही है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। उसने तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में भी विचार किया था और अब जब बीबीसी अपनी विवादित डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध के खिलाफ उसके दरवाजे पर गई है तो उसे उसकी भी सुननी होगी।

 

करदाता जनता में से ही आते हैं, न्यायपालिका क्यों रहे उनकी आभारी

पांचजन्य ने अपने संपादकीय में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट भारत का है जो भारत के करदाताओं की राशि से चलता है, उसका काम उस भारतीय विधान और विधियों के अनुरूप काम करना है जो भारत के हैं, भारत के लिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय नामक सुविधा का सृजन और उसका रखरखाव हमने अपने देश के हितों के लिए किया गया है। लेकिन वह भारत विरोधियों के अपना मार्ग साफ करने के प्रयासों में एक औजार की तरह प्रयुक्त हो रहा है। आखिर न्याय की अवधारणा पर पांचजन्य के संपादकीय में की गई यह टिप्पणी किस प्रकार उचित ठहराई जा सकती है। न्याय की अवधारणा वैश्विक होती है, कोई अदालत किसी विदेशी आरोपी को यह कह कर कैसे सजा दे सकती है कि वह हर हाल मेंं अपने नागरिक के अधिकारों का दायित्व ही निभाएगी। भारत तो वह देश है, जिसने मुंबई हमले के आरोपी कसाब पर ट्रायल चलाया। अन्य कोई देश होता तो बहुत पहले उसे मौत की सजा सुना दी गई होती।
 

दुराग्रह पूर्ण सोच से नहीं चलेगा काम

प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी पर बीबीसी द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार को नोटिस भेजे जाने का मुद्दा उठाते हुए पांचजन्य के संपादकीय में लिखा गया है कि मानवाधिकारों के नाम पर आतंकियों को बचाने, पर्यावरण संरक्षण के नाम पर भारत के विकास में रोड़े अटकाने, भारत की प्रतिरक्षा तैयारियों में अड़ंगा लगाने के बाद अब भारत विरोधी ताकतें एक कदम आगे बढ़कर यह प्रयास कर रही हैं कि उन्हें भारत में दुष्प्रचार करने का अधिकार होना चाहिए,भारत में धर्मांतरण करके राष्ट्र को कमजोर करते रहने का अधिकार भी होना चाहिए और इतना ही नहीं, इस अधिकार के प्रयोग के लिए भारत के ही कानूनों को लाभ भी उन्हें मिलना चाहिए।
 

लोकतंत्र की मूल अवधारणा का न बने मजाक
दरअसल, पांचजन्य की विचारधारा राष्ट्रवादी है, जिसका सम्मान होना चाहिए लेकिन आवश्यकता इस बात की भी है कि हम बतौर देश खुद को ऐसे विचारों और सोच से सीमित न कर लें जोकि लोकतंत्र की मूल अवधारणा का मजाक बना दें। लोकतंत्र में विचार की स्वतंत्रता होती है लेकिन अगर हमारी सोच कट्‌टर हो जाएगी तो यह भारतीय लोकतंत्र की मूल अवधारणा के विपरीत होगी। बीबीसी की अगर ऐसी सोच है कि भारत के संबंध में नकारात्मक विचार उत्पन्न करे तो इसका मुकाबला विचार से होना चाहिए। हालांकि बीबीसी को अगर लगता है कि वह सही है और उसने जो अपनी डॉक्यूमेंट्री में कहा है, वह जायज है तो उसे इसको साबित करने का हक है। इसी अधिकार के नाते वह सर्वोच्च न्यायलय में गई है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की क्षमता और उसके अधिकार क्षेत्र पर हमलावर होना, उसे कमजोर ही बनाएगा। पिछले कुछ समय के दौरान देश में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तकरार बढ़ी है, जोकि अनावश्यक है। जाहिर है, दोनों का कार्य देश की जनता की सेवा करना है, प्रत्येक का अपना-अपना दायरा है, फिर कोई अपने आप को सर्वोच्च क्यों समझे। आरएसएस की पत्रिका पांचजन्य में प्रकाशित संपादकीय भाजपा और उसकी केंद्र सरकार का बचाव करते नजर आता है।