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बुनकर नगरी में जीवंत है गुरु-शिष्य की परम्परा

हिन्दू धर्म में गुरु का दर्जा देव से बड़ा माना गया गया। माना गया है कि सांसारिक भवसागर को पार करने में मानव को केवल गुरु ही रास्ता दिखा सकते हैं। गुरु के ज्ञान और उपदेश पर अमल करके ही व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

आधुनिकता के दौर में जब गुरु शिष्य की प्राचीन परम्परा लुप्त हो रही है तब भी गुरु शिष्य की प्राचीनतम परम्परा जनपद की बुनकर नगरी टाण्डा के छज्जापुर मोहल्ले के उदासीन संगत (आश्रम) बड़ा फाटक में कायम है। अयोध्या के रानोपाली में स्थित उदासीन आश्रम के बाद अवध और पूर्वांचल के जनपदों के सबसे बड़े आश्रम में टाण्डा के इस आश्रम की गिनती होती है।

उदासीन संगत बड़ा फाटक छज्जापुर टाण्डा में कुल छह गुरुओं की समाधियां हैं। इनमें दो लुप्त यानि अज्ञात हैं। अन्य चार गुरुओं बाबा संतप्रसाद दास, बाबा हरिकिशुन दास, बाबा शंकर दास और बाबा रामशरण दास की समाधि आश्रम में है। आश्रम के महंत डा. चंद्रप्रकाश त्रिपाठी ने हाल के वर्षों में आश्रम का जीर्णोद्धार कराया है। साथ ही भव्य मंदिर बनवाया है।

छह जनपद में फैले है आश्रम के शिष्य
उदासीन संगत के शिष्यों का बड़ा समूह है। कुल छह जिलों क्रमश: बस्ती, संत कबीरनगर, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, गोरखपुर और अम्बेडकरनगर में आश्रम के शिष्य है।

गुरु पूर्णिमा पर होगा खास आयोजन

भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले महर्षि वेदव्यास का अवतरण दिवस जयंती 16 जुलाई को है। 16 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पर्व है। इस दिन उदासीन संगत आश्रम बड़ा फाटक छज्जापुर टांडा में खास आयोजन होगा। छह जनपदों के शिष्यों का जमावड़ा होगा। इस दौरान गुरु का अरदास और गुरु की आरती मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेगी। साथ ही भंडारे का आयोजन होगा। आश्रम के महंत डा. चंद्र प्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि शिष्य गुरुओं का अरदास कर मनौती मांगते है।

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