नव-निर्वाचित 46 नगर निकायों में उपाध्यक्ष का चुनाव अगले 6 माह में करवाना कानूनन आवश्यक - एडवोकेट
नव-निर्वाचित 46  नगर निकायों में  उपाध्यक्ष का चुनाव अगले  6 माह में करवाना कानूनन आवश्यक - एडवोकेट

नव-निर्वाचित 46 नगर निकायों में उपाध्यक्ष का चुनाव अगले 6 माह में करवाना कानूनन आवश्यक - एडवोकेट

नव-निर्वाचित 46 नगर निकायों में उपाध्यक्ष का चुनाव अगले 6 माह में करवाना कानूनन आवश्यक - एडवोकेट

अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सम्बंधित नगर परिषद/पालिका तत्काल प्रभाव से हो जायेगी भंग  


चंडीगढ़ - हरियाणा  की कुल 46 नगर निकायों (18 नगर परिषदों एवं 28 नगर पालिकाओं) के आम  चुनावों, जिनके  लिए गत   19 जून को   मतदान हुआ था,  की    मतगणना  में  सत्तासीन भाजपा -जजपा के उम्मीदवारों ने  कुल 25 ( 22 भाजपा और 3 जजपा) नगर  निकायों के अध्यक्ष पद पर जीत का परचम लहराया जबकि  19 निकायों में निर्दलीय प्रत्याशी और   एक-एक निकाय में इनेलो और आप पार्टी  के  उम्मीदवार  ने जीत हासिल की है. 
उपरोक्त सभी  46  निकायों के कुल 888 वार्डों में से 815 में  निर्दलीय और  60  में भाजपा, 6  में  इनेलो, 5 में आप और एक में बसपा जीती है. 

बहरहाल, इसी बीच पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने  एक रोचक परन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी सांझा करते हुए  बताया कि वर्ष 2019 में प्रदेश विधानसभा द्वारा हरियाणा म्युनिसिपल कानून, 1973 , जो प्रदेश की सभी नगर पालिकाओं और नगर परिषदों पर लागू होता है, में डाली गयी नई धारा 18 ए के अनुसार इन  सभी के  आम चुनावो में नव-निर्वाचित अध्यक्ष एवं वार्ड सदस्यों (जिन्हे आम भाषा में पार्षद कहा जाता है हालांकि यह शब्द हरियाणा म्युनिसिपल कानून में नहीं है ) की राज्य चुनाव  आयोग द्वारा जारी निर्वाचन नोटिफिकेशन के अधिकतम छः माह के भीतर उन सभी नगर निकायों में  उपाध्यक्ष (वाईस -प्रेजिडेंट ) का चुनाव होना  कानूनन आवश्यक है. अगर ऐसा नहीं किया जाता है, तो उपरोक्त छः माह की अवधि समाप्त होने पर सम्बंधित नगर निकाय अर्थात नगर परिषद या नगर पालिका को तत्काल प्रभाव से विघटित (भंग) समझा जाएगा.

हेमंत ने बताया कि सर्वप्रथम वर्ष 2019 में हरियाणा विधानसभा के बजट सत्र के दौरान  हरियाणा नगरपालिका (संशोधन) कानून, 2019 पारित किया गया था जिसके द्वारा हरियाणा नगरपालिका कानून, 1973 में संशोधन कर नई धारा 18 ए डाली गयी थी जिसमें यह प्रावधान किया गया था कि नगर परिषद/पालिका के आम चुनावो में निर्वाचित सदस्यों की राज्य चुनाव  आयोग द्वारा जारी निर्वाचन नोटिफिकेशन के अधिकतम छः  माह के भीतर उन सभी के अध्यक्ष (प्रेजिडेंट ) और उपाध्यक्ष (वाईस -प्रेजिडेंट ) का चुनाव होना  कानूनन आवश्यक होगा एवं अगर  अगर ऐसा नहीं किया जाता , तो उपरोक्त छः माह की अवधि समाप्त होने पर सम्बंधित नगर निकाय अर्थात नगर परिषद या नगर पालिका को तत्काल प्रभाव से विघटित (भंग) समझा जाएगा.

हालांकि उसके कुछ समय  बाद उसी वर्ष 2019 में प्रदेश  विधानसभा के मानसून सत्र में उपरोक्त धारा 18 ए में पुन: संशोधन कर उसमें से अध्यक्ष (प्रेजिडेंट ) पद का सन्दर्भ हटा दिया गया क्योंकि  हरियाणा नगरपालिका (दूसरा  संशोधन) कानून, 2019 के अनुसार यह प्रावधान कर दिया गया कि हर नगर निकाय अध्यक्ष का चुनाव  सम्बंधित निकाय क्षेत्र में सभी रजिस्टर्ड मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष /सीधे तौर पर  किया जाएगा ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वार्ड सदस्य (पार्षद ) का चुनाव होता है. अत: नगर निकाय क्षेत्र का हर मतदाता वर्ष 2019 के बाद स्थानीय आम चुनावों के दौरान दो वोट डालता है- एक अपने सम्बंधित वार्ड प्रतिनिधि के चुनाव हेतु और दूसरा नगर निकाय के अध्यक्ष पद के लिए.

एडवोकेट हेमंत ने बताया कि वर्ष 2019 से उपरोक्त कानूनी संशोधन से पूर्व तक  हरियाणा नगरपालिका कानून, 1973 ,में नगर परिषद/पालिका के उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचन हेतु  हालांकि  कोई अधिकतम समय अवधि निर्धारित नहीं थी. हालांकि  हरियाणा नगरपालिका चुनाव नियमावली, 1978  के तहत ऐसा चुनाव  दो माह में करवाने का उल्लेख था  परन्तु  प्राय: इसका गंभीरता से अनुपालन नहीं किया जाता था.

हेमंत ने बताया कि मौजूदा  धारा 18 ए के  अनुसार सम्बंधित जिले का डिप्टी कमिश्नर (डी.सी.) या उसके द्वारा नामित कोई गज़ेटेड अधिकारी नगर पालिका/परिषद के आम चुनावो के बाद चुने गए नव-निर्वाचित  अध्यक्ष/सदस्यों  के नामों की निर्वाचन नोटिफिकेशन जारी  होने के 30  दिन के भीतर 48 घंटे के नोटिस पर इसकी  पहली मीटिंग बुलाएगा एवं जिसमे  सभी नव-निर्वाचित पदाधिकारियों को पद और निष्ठा की  शपथ दिलवाई जायेगी. इस पहली मीटिंग के एक माह के अंदर ही डी.सी. अथवा उसके द्वारा नामित गज़ेटेड अधिकारी द्वारा  दूसरी मीटिंग बुलवाई जायेगी जिसमे शपथ से वंचित रह चुके पार्षदों को शपथ दिलवाई जायेगी एवं नव गठित नगर पालिका/परिषद् के  उपाध्यक्ष का चुनाव करवाया जाएगा. अगर ऐसा नहीं हो पाता, तो दूसरी मीटिंग के 30 दिन के भीतर तीसरी मीटिंग बुलाई जायेगी एवं  उपाध्यक्ष का चुनाव करवाया जाएगा. अगर नगर पालिका/ परिषद  के गठन के पांच माह के भीतर सम्बंधित नगर पालिका/परिषद के उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हो पाता, तो अंतिम बार इस निर्देश के साथ डी.सी. या उसके द्वारा नामित गज़ेटेड अधिकारी द्वारा मीटिंग  बुलवाई जायेगी कि अगर उस मीटिंग में भी  उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हो पाया. तो सम्बंधित  नगर पालिका या नगर परिषद् को बिना किसी और नोटिस एवं आदेश के भंग / विघटित समझा जाएगा. जिसका अर्थ है कि  सम्बंधित नगर पालिका या नगर परिषद् के चुनाव नए सिरे से करवाने पड़ेंगे.  निश्चित तौर पर उक्त संशोधन स्वागत योग्य है क्योंकि प्राय: ऐसा देखा जाता है कि समय पर नव गठित नगर पालिका या नगर परिषद के उपाध्यक्ष का चुनाव   नहीं हो  पाता है एवं कई बार यह  मामले हाई कोर्ट तक पहुँच जाते हैं.