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इन्सान नाना प्रकार के भ्रमों से ग्रस्त है : निरंकारी बाबा

खांड ही का नाम लेत मुख केसे मीठा होत,
मुख पुनि मठा होत खांड के चबान से।
कि केवल मीठे की रटन से हमारा मुख मीठा नहीं हो जायेगा। वो शक्कर मुख में डालनी होगी तब हमारा मुख मीठा होगा, केवल शब्दों से नहीं। इसीलिए महापुरुष-संतजन कहते हैं कि अगर सुख की चाहना रखते हैं, एक ऐसे माहौल की, एक ऐसी अवस्था की चाहना रखते हैं, तो उसके लिए सही मायनों में इसके साथ जुडऩा होगा। यह बोध हासिल करना होगा। वो दीपक की लौ जगानी होगी, यह नहीं कि दीपक ऐसे ही पड़ाहुआ है। जब लौ जग जाती है तो रोशनी हो जाती है। अगर ये धन प्राप्त हो जाता है तो मालामाल हो जाते हैं। वरना दौलत का भी जिक्र तो किया जा सकता है। एक झोंपड़ी में रहने वाला या जो कंगालता की हालत में है, जो गुरबत की हालत में हैं, वो भी दौलत का, पैसों का, हजारों-लाखों-करोड़ों की रकम का जिक्र कर सकता है।

जिक्र करने में क्या मुश्किल है, लेकिन केवल जिक्र करना अमीर नहीं बनाता है, वो उसकी लाचारी को दूर नहीं करता है। यानि कि जिक्रों, पढ़ाईयों, पाठ, जप-तप इनसे आगे निकलने के लिए महापुरुष प्रेरित कर रहे हैं कि इसी से बात बनेगी, इससे हटकर किसी की भी बात बनी नहीं है। ब्रह्म की प्राप्ति ही भ्रमों का नाश करती हैं, इसीलिए ये पंक्ति दोहराई जाती है-
ब्रह्म की प्राप्ति भ्रम की समाप्ति।

ब्रह्म जो है, ईश्वर जो है, पारब्रह्म परमात्मा जो है इसकी लखता, इसकी प्राप्ति हो जाती है तो भ्रम-भ्रान्तियों का नाश हो जाता है। कैसे-कैसे भ्रमों में इन्सान पड़ा हुआ है। पहले तो ये भी एक भ्रम ही है कि इन्सान आग से ठण्डक की उम्मीद करता है। विपरीत चाल चलकर मंजिल पर पहुंचने के लिए वो सोचता हे कि यह उचित रास्ता है। एक भ्रम में पल रहा है और जिस तरफ मुख करके मंजिल पर पहुंचना मुमकिन होना है, उस तरफ तो मुख है ही नहीं, मुख तो विपरीत दिशा की तरफ है। लेकिन मन में भ्रम है कि मैं मंज़िल के करीब होता जा रहा हू। जितने-जितने कदम धर रहा हूँ, मैं मंज़िल के और करीब हो रहा हूं, लेकिन वो भ्रम के अन्तर्गत और दूर होता चला जा रहा है।

नाना प्रकार के भ्रमों का रोगी बना हुआ है। भ्रमों से ग्रस्त है। इन भ्रमों को दूर करना है। इस आत्मा का भी भ्रम है। ये मन भी हमारा भ्रम में पड़ा हुआ हे और साधन वो ही रहेगा-प्रभु परमात्मा की प्राप्ति। ये हमारी आत्मा के भ्रम को भी दूर करता है और हमारे मन में भी जो भ्रम हैं, उनको भी दूर करता है। कितने-कितने प्रकार के भ्रमों में लोग जी रहे हैं जहां पर कोई जाति-पाँति के बन्धन में पड़ा हुआ है क्योंकि ये भी एक बहुत बड़ा भ्रम है कि मेरी जाति ऊंची है, उसकी जाति नीची है। ये भी एक भ्रम है और ये भ्रम उसी अज्ञानता के कारण है, क्योंकि उसको ये बोध नहीं है। वो जाति-पाँति किस आधार पर मान बैठ गया है कि जिसको वह नीची जाति वाला कह रहा है। क्या उसमें पांच तत्व की बजाय तीन तत्व लगे हुए हैं, या उसकी आत्मा परमात्मा की अंश ही नहीं है, वो कहीं और से आई है?

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