Saturday, September 21, 2019
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हरियाणा में इनेलो-बसपा गठबंधन संकट में

हरियाणा में इनेलो और बसपा का गठबंधन टूट के कगार पर है। दोनों दलों के बीच कोई 10 महीने पहले की दोस्ती को ग्रहण लग गया। इनेलो की ओर से एसवाईएल को लेकर गत वर्ष चलाए गए आंदोलन के दौरान बसपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था, इसके बाद दोनों दलों के बीच सीटों की हिस्सेदारी को लेकर भी खबरें आई थी, इसी दौरान नेता विपक्ष अभय चौटाला ने बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात की थी। वहीं बीते वर्ष गोहाना में पार्टी की रैली जोकि इनेलो की टूट की वजह बनी में भी बसपा नेता शुमार थे। हालांकि इसके बाद जींद उपचुनाव ने जहां इनेलो की हकीकत सामने ला दी, वहीं बसपा को मौका मिल गया। अब बसपा के नेता इनेलो से अलग होने को बेकरार हैं। इस टूट की वजह क्या हो सकती है, क्या बसपा को कोई दूसरा साथी पसंद आ गया है, या फिर उसने एकला चलो की रणनीति पर काम शुरू किया है। हालांकि इनेलो की ओर से अभी भी गठबंधन को जारी रखने की मंशा जाहिर की गई है।

दरअसल, बसपा का जनाधार पिछले चुनाव की तुलना में बढ़ा है, पार्टी गुरूग्राम, फरीदाबाद और एनसीआर में अच्छी पकड़ रखती है। उसकी योजना इनेलो के साथ चलते हुए बेहतर सीटें हासिल करके प्रदेश में अपना वर्चस्व कायम करने की थी, लेकिन जींद उपचुनाव के परिणाम ने बसपा को इनेलो के साथ चलने पर सोचने को मजबूर कर दिया। उसके रणनीतिकारों को लगता है कि उपचुनाव में बुरे तरीके से हार चुकी इनेलो का प्रदर्शन आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में और प्रभावित हो सकता है। अगर वह उसके साथ चली तो इसका खामियाजा उसे भी भुगतना पड़ सकता है। गौरतलब है कि इनेलो सुप्रीमो को जींद उपचुनाव के दौरान ही फरलो पर जेल से बाहर आना था लेकिन किसी वजह से ऐसा नहीं हो पाया। हालांकि इस मसले पर भी जजपा नेताओं और इनेलो के बीच गहरे आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं। अब इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला के फिर जेल से बाहर आने की संभावना जाहिर की गई है। कहा गया है कि वे बसपा सुप्रीमो मायावती से इस संबंध में बात करेंगे। यह भी कहा गया है कि अब वे ही गठबंधन को टूटने से बचा सकते हैं।

कहते हैं, राजनीति में न स्थाई दोस्ती होती है और न ही दुश्मनी। इस मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। बसपा सुप्रीमो मायावती के मन में क्या है, यह वही जानती हैं, लेकिन चौटाला परिवार के बीच जो खाई बनी है, उसे बहाना बनाकर बसपा ने इनेलो से दूरी बनाई है। मायावती का कहना है कि पहले इनेलो और जननायक जनता पार्टी के नेता एक हो जाएं। यानी इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला अपने बेटे अजय चौटाला और उनके पुत्रों का निष्कासन खारिज करें। बसपा सुप्रीमो की यह मांग सामाजिक रूप से एक नेक सलाह है, लेकिन राजनीतिक रूप से शायद ऐसा हालफिलहाल ऐसा होना संभव नहीं दिखता। जींद उपचुनाव में जननायक जनता पार्टी के उम्मीदवार दिग्विजय चौटाला को भाजपा उम्मीदवार के बाद दूसरा स्थान हासिल हुआ है और उन्होंने कड़ी चुनौती पेश कर सत्तापक्ष के मंत्रियों, विधायकों को जींद में डेरा डालने को मजबूर कर दिया था। हालांकि कांग्रेस उम्मीदवार से मुकाबले के लिए भी सत्तापक्ष की सरगर्मी जींद में बढ़ी थी लेकिन इसका अंदाजा नहीं था कि महज दो-ढाई महीने खड़ी हुई एक पार्टी के उम्मीदवार को ऐसा रिस्पांस हासिल होगा।

गौरतलब है कि बसपा की ओर से रोहतक में समीक्षा बैठक में कहा गया है कि इनेलो-बसपा का गठबंधन होने के बावजूद जींद उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार जीत गया। क्योंकि मतदाता को इनेलो पर भरोसा नहीं रहा। वहीं इनेलो से जजपा के अलग होने की वजह से भी जनता के लिए जजपा की इनेलो से ज्यादा अहमियत हो गई है। बहरहाल, यह बेमेल गठबंधन रहेगा या टूट जाएगा, इसका खुलासा जल्द हो सकता है। दो पार्टियां जब साथ आती हैं, तो अपना-अपना अस्तित्व कायम करके चलती हैं, अगर जींद उपचुनाव में इनेलो उम्मीदवार दूसरे या तीसरे नंबर पर भी रहता तो बसपा का साथ इनेलो को मिलता रहता, लेकिन इनेलो उम्मीदवार तो अपनी जमानत तक नहीं बचा सका। अगर गठबंधन टूटता है तो इसका फायदा भाजपा को ही मिलने की संभावना है। प्रदेश में हालफिलहाल कांग्रेस का मनोबल गिरा हुआ है वहीं इनेलो-बसपा गठबंधन के बीच खटपट जारी है, वहीं जजपा का अभी राज्य स्तरीय फैलाव नहीं है। राजनीति के संग्राम में कौन बाजी मारता देखने वाली बात होगी।

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