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जीवन को हर रोज नया अर्थ दे : मुनिश्री विनय कुमार जी

इंसान का अपना प्रिय जीवन-संगीत टूट रहा है। वह अपने से, अपने लोगों से और प्रकृति से अलग हो रहा है। उसका निजी एकांत खो रहा है और रात का खामोश अंधेरा भी। इलियट के शब्दों में, ‘कहां है वह जीवन जिसे हमने जीने में ही खो दिया।Ó फिर भी हमें उस जीवन को पाना है जहां इंसान आज भी अपनी पूरी ताकत, अभेद्य जिजीविषा और अथाह गरिमा और सतत पुरुषार्थ के साथ जिंदा है। इसी जिजीविषा एवं पुरुषार्थ के बल पर वह चांद और मंगल ग्रह की यात्राएं करता रहा है।

उसने महाद्वीपों के बीच की दूरी को खत्म किया है। वह अपनी कामयाबियों का जश्न मना रहा है फिर भी कहीं-न-कहीं इंसान के पुरुषार्थ की दिशा दिग्भ्रमित रही है कि मनुष्य के सामने हर समय अस्तित्व का संघर्ष कायम है। जब हम अपनी ही सोच और क्षमताओं पर संदेह करने लगते हैं तब अंधेरा घना होता है। तभी लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता। लेखिका एलेक्जेंड्रा फ्रेन्जन कहती हैं, ‘अगर दिल धडक़ रहा है, फेफड़े सांस ले रहे हैं और आप जिंदा हैं तो कोई भी भला, रचनात्मक और खुशी देने वाला काम करने में देरी नहीं हुई है। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने अणुव्रत भवन तुलसी सभागार में कहे।

मनीषी संत ने आगे कहा आज पूरी दुनिया में उथल-पुथल का दौर चल रहा होता है, ऐसी स्थितियों में अक्सर लोग लक्ष्य को पाने की आस छोड़ देते हैं। उनका सारा ध्यान महज अपने अस्तित्व को बचाए रखने में लग जाता है। लक्ष्य का होना जीवन को स्पष्टता देता है। अच्छी खबर यह है कि आप बंधी-बंधाई सुरक्षित राहों के इतर राह चुनते हैं तो उन अवसरों पर सोचना भी आसान हो जाता है, जो आपको मुश्किल लगती थीं। परिवर्तन की इस संधि-बेला में, इस भूमण्डलीकरण, आर्थिक आजादी और आक्रामकता के दौर में एक ऐसी मानवीय संरचना की आवश्यकता है जहां इंसान और उसकी इंसानियता दोनों बरकरार रहे। इसके लिये मनुष्य को भाग्य के भरोसे न रहकर पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। पुरुषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाता बल्कि

सफलता का सूत्रधार है पुरुषार्थ। इसके लिये जरूरी है आप हर रोज अपने सपनों के बारे में सोचें और उनको आकार देने के लिये तत्पर हो।
मनीषी श्रीसंत ने कहा हालांकि इस संघर्ष और विश्वास से उसको नयी ताकत, नया विश्वास और नयी ऊर्जा मिलती है और इसी से संभवत: वह स्वार्थी बना तो परोपकारी भी बना। वह क्रूर बना तो दयालु भी बना, वह लोभी व लालची बना तो उदार व अपरिग्रह भी बना। वह हत्यारा और हिंसक हुआ तो रक्षक और जीवनदाता भी बना। आज उसकी चतुराई, उसकी बुद्धिमता, उसके श्रम और मनोबल पर चकित हो जाना पड़ता है। इस सबके बावजूद जरूरत है कि इंसान का पुरुषार्थ उन दिशाओं में अग्रसर हो जहां से उत्पन्न सद्गुणों से इंसान का मानवीय चेहरा दमकने लगे। इंसान के सम्मुख खड़ी अशिक्षा, कुपोषण और अन्य जीने की सुविधाओं के अभाव की विभीषिका समाप्त हो।

वह जीवन के उच्चतर मूल्यों की ओर अग्रसर हो। सत्य, अहिंसा, सादगी, सच्चाई और मनुष्यता के गुणों के बारे में उसकी आस्था कायम रहे। मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया मनुष्य को अपना प्रयास नहीं छोडऩा चाहिए। किसी काम में सफलता मिलेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता. भविष्य में क्या होने वाला है, सब अनिश्चित है। यदि कुछ निश्चित है तो वह है व्यक्ति का अपना पुरुषार्थ। सफलता मिलेगी या नहीं इसकी चिंता छोड़कर केवल अपना काम करता चले। सफलता मिल गई।

जैन धर्म की अङ्क्षहसा का मार्गदर्शन करती है : सत्यदेव नारायण

हरियाणा के महामहिम श्री सत्यदेव नारायण आर्य ने मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक से विचार विमर्श करते हुए कहा मै गौरवशाली हूं मुझे भगवान महावीर की धरती पर जन्म लिया। जैन धर्म की अहिंसा आज भी विश्व का मार्गदर्शन करती है। जैन धर्म मे आलौकिता भरी है। उन्होंने प्रश्न उठाते कहा महावीर एक थे और आज जैन धर्म कई भागों में विभक्त है इसका क्या कारण है। जैन धर्म ही नहीं सभी धर्म अपने गुरूओं द्वारा बताये गए रास्तों से भटके है। फिर भी जैन धर्म के साधको मे साधना सर्वोपरी आज भी है। मनीषीसंत ने आचार्य श्री महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी की विस्तृत जानकारी दी। हाल ही मे पंजाब राजभवन मे हुए कार्यक्रम का उल्लेख किया। अणुव्र आंदोलन के बारे मे मनीषींसत ने बोलते हुए कहा अणुव्रत मानवता की अवश्यकता है, भटके हुए समाज को सही मार्ग पर लाने का राजपथ है। जब तक व्यक्ति की चेतना का उध्र्वारोहण नही होता है तब तक राष्ट्र का उध्र्वारोहण नही हो सकता। महामहिम ने राजगृह निवासी है और जहां से 6 बार विधानसभा मे निर्वाचित हो चुके है।

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