उत्तराखंड में डिप्लोमा इंजीनियरों की हड़ताल तेज: विकास कार्य और जरूरी सेवा पर ब्रेक
Diploma Engineers' Strike Intensifies in Uttarakhand
देहरादून। Diploma Engineers' Strike Intensifies in Uttarakhand, प्रदेश सरकार की ओर से एस्मा लागू करने की चेतावनी दिए जाने के बावजूद उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ के बैनर तले चल रही डिप्लोमा इंजीनियरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल अब और आक्रामक हो गई है।
27 सूत्रीय मांगों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन के तहत प्रदेशभर में लगभग चार हजार डिप्लोमा इंजीनियर गुरुवार को भी कार्यबहिष्कार पर रहे, जिससे विकास योजनाओं से लेकर आवश्यक सेवाओं तक व्यापक असर दिखाई देने लगा है।
जारी रहेगी हड़ताल
गुरुवार को लोक निर्माण विभाग मुख्यालय, देहरादून में आयोजित धरने में विभिन्न विभागों के अभियंताओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कहा कि जब तक शासन स्तर पर मांगों पर ठोस निर्णय नहीं होगा, तब तक हड़ताल जारी रहेगी।
महासंघ की अनुशासन समिति ने इस बार आंदोलन को और प्रभावी बनाते हुए तकनीकी और फील्ड कार्यों को व्यापक स्तर पर प्रभावित करने की रणनीति अपनाई है। हड़ताल का सबसे बड़ा असर राज्य की बड़ी परियोजनाओं पर पड़ा है। चारधाम यात्रा की तैयारियों से जुड़े सड़क और पुल कार्य, जमरानी बांध परियोजना, सौंग बांध परियोजना, सीवर लाइन विस्तार, डामरीकरण, राज्य और जिला योजना के निर्माण कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क और पुल निर्माण की गति भी धीमी पड़ गई है। कुंभ मेला 2027 की तैयारियों से जुड़े कई कार्यों पर भी दबाव बढ़ने लगा है। सचिवालय, प्रमुख अभियंता सिंचाई कार्यालय, पेयजल निगम मुख्यालय और तकनीकी इकाइयों में कार्यों की गति कम हो गई है।
महासंघ का कहना है कि अभियंताओं की अनुपस्थिति में निर्माण कार्यों की तकनीकी निगरानी नहीं हो पा रही। इससे गुणवत्ता परीक्षण, मापन और भुगतान जैसी प्रक्रियाएं भी रुक गई हैं। महासंघ ने स्पष्ट किया है कि हड़ताल के दौरान अभियंता की उपस्थिति के बिना किए गए किसी भी निर्माण कार्य का न तो मापन होगा और न भुगतान किया जाएगा।
शहरी क्षेत्रों में भी असर बढ़ा
एमडीडीए और एचआरडीए के तहत भवन मानचित्र स्वीकृति, अवैध निर्माणों पर तकनीकी रिपोर्ट, निरीक्षण और अन्य विकास संबंधी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। इससे कई प्रशासनिक निर्णय लंबित पड़ने लगे हैं।
धरना स्थल पर वक्ताओं ने कहा कि प्रदेश की अधिकांश तकनीकी परियोजनाएं डिप्लोमा इंजीनियरों की फील्ड उपस्थिति पर आधारित हैं, इसलिए आंदोलन का प्रभाव व्यापक होना स्वाभाविक है। उन्होंने सरकार से शीघ्र वार्ता कर समाधान निकालने की मांग दोहराई।
आवश्यक सेवाओं पर दिखने लगा असर
अब आंदोलन का प्रभाव आवश्यक सेवाओं तक पहुंचने लगा है। पेयजल निगम, जल संस्थान, सिंचाई विभाग और उत्तराखंड जल विद्युत निगम के अभियंताओं के शामिल होने से पेयजल आपूर्ति, ऊर्जा उत्पादन और जल प्रबंधन पर दबाव बढ़ गया है। सिंचाई विभाग में नहर सफाई, बाढ़ नियंत्रण, नहर मरम्मत और जल प्रवाह प्रबंधन कार्य प्रभावित बताए जा रहे हैं।
कर्मचारी संगठनों का भी मिला समर्थन
आंदोलन को उत्तराखंड अधिकारी-कर्मचारी-शिक्षक समन्वय समिति, सिंचाई कर्मचारी महासंघ, उत्तराखंड सचिवालय संघ और लोक निर्माण विभाग मिनिस्टीरियल एसोसिएशन का समर्थन मिल चुका है। संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि मांगों पर निर्णय नहीं हुआ तो आंदोलन का दायरा और बढ़ सकता है।
सबसे ज्यादा असर यहां
चारधाम मार्गों की मरम्मत, जमरानी और सौंग बांध परियोजनाएं, पीएमजीएसवाई सड़कें, देहरादून के आरओबी, टोंस पुल, पेयजल योजनाएं, नहर मरम्मत, भवन मानचित्र स्वीकृति और जल विद्युत इकाइयों की तकनीकी निगरानी सबसे अधिक प्रभावित हो रही है।