डीआईजी भुल्लर रिश्वत मामले में सीबीआई की रोजाना सुनवाई की अर्जी पर बचाव पक्ष का विरोध
Defense Opposes CBI's Plea for Daily Hearings
चंडीगढ़, 4 मई — Defense Opposes CBI's Plea for Daily Hearings, रिश्वत मामले में फंसे पंजाब पुलिस के निलंबित डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार केस में सीबीआई द्वारा केस की रोजाना सुनवाई को लेकर दायर अर्जी का बचाव पक्ष ने सोमवार को विशेष अदालत में जवाब दाखिल कर विरोध किया है l सीबीआई की अर्जी पर अदालत ने बचाव पक्ष को नोटिस जारी किया था l
सीबीआई ने अपनी अर्जी में कहा था कि मामला उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है और आरोपी प्रभावशाली हैं, ऐसे में केस लंबा चलने पर जांच प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर ट्रायल की रोजाना सुनवाई की मांग की गयी।
इस अर्जी के जवाब में आरोपी हरचरण सिंह भुल्लर और सह-आरोपी कृष्णु शारदा की ओर से अदालत में अलग-अलग जवाब दाखिल किए गए हैं, जिनमें सीबीआई के आवेदन का विरोध किया गया । जवाब दाखिल होने के बाद अब बहस के लिए 6 मई की तिथि तय की गई है l वही,
हरचरण सिंह भुल्लर ने अपने जवाब में कहा है कि सीबीआई का आवेदन पूरी तरह से गलत, समय से पहले और दुर्भावनापूर्ण है। उनका कहना है कि अभी तक बीएनएसएस की धारा 230 के तहत जरूरी दस्तावेजों की पूरी प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई गई हैं, जिससे ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ है। ऐसे में देरी का मुद्दा उठाना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 3 दिसंबर 2025 को अधूरी चार्जशीट जल्दबाजी में दाखिल की गई ताकि उन्हें डिफॉल्ट बेल का लाभ न मिल सके, जबकि उस समय सीएफएसएल की रिपोर्ट लंबित थी।
वहीं, सह-आरोपी कृष्णु शारदा ने अपने जवाब में कहा है कि उन्हें एफआईआर और चार्जशीट में झूठा फंसाया गया है। उन्होंने अदालत को बताया कि संज्ञान आदेश को वापस लेने की उनकी अर्जी 27 अप्रैल 2026 को खारिज हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में ट्रायल को तेजी से शुरू करने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है और केस को अन्य मामलों से अलग मानकर जल्दबाजी में चलाने का कोई आधार नहीं है।
दोनों आरोपियों ने कहा कि निष्पक्ष ट्रायल के लिए सभी कानूनी प्रावधानों का पालन जरूरी है और बचाव पक्ष को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए, खासकर तब जब वे न्यायिक हिरासत में हैं। उनका कहना है कि जल्दबाजी में ट्रायल चलाने से उन्हें अपने बचाव का पूरा अवसर नहीं मिल पाएगा और इससे गंभीर नुकसान होगा।
आरोपी पक्ष ने यह भी कहा कि उन्होंने कभी भी मामले में देरी नहीं की, बल्कि अभियोजन पक्ष ही सप्लीमेंट्री चालान और अन्य आवेदनों के जरिए समय लेता रहा है।
अनरिलाइड दस्तावेजों की डिटेल देने की मांग को लेकर अदालत में अर्जी दायर :
वहीं, विशेष सीबीआई अदालत में आरोपी पक्ष की ओर से एक अन्य अर्जी दायर की गई, जिसमें सीबीआई को अनरिलाइड दस्तावेजों की सूची में शामिल कुछ दस्तावेजों का न्यूनतम विवरण देने के निर्देश देने की मांग की गई।
अर्जी में कहा गया है कि 27 अप्रैल 2026 को सीबीआई ने आरोपियों को अनरिलाइड दस्तावेजों और आर्टिकल्स की सूची उपलब्ध कराई थी, लेकिन उसमें कुछ दस्तावेजों के बारे में जरूरी जानकारी नहीं दी गई है।
आरोपी पक्ष का कहना है कि बिना न्यूनतम विवरण के यह समझ पाना संभव नहीं है कि संबंधित दस्तावेज किस आरोपी से जुड़े हैं, उनका विषय क्या है और उनका महत्व क्या है।
अर्जी में विशेष तौर पर दो दस्तावेजों का उल्लेख किया गया है। इसमें सीरियल नंबर 3 पर दर्ज नोटबुक के संबंध में न तो जब्ती की तारीख और स्थान स्पष्ट किया गया है और न ही यह बताया गया है कि वह फार्म किसका है। वहीं, सीरियल नंबर 4 में लॉकर ऑपरेशन मेमो से संबंधित बैंक और लॉकर के मालिक का भी उल्लेख नहीं किया गया है।
आरोपी पक्ष ने अदालत से मांग की है कि इन दस्तावेजों का न्यूनतम विवरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे अपने बचाव के लिए इनका सही तरीके से उपयोग कर सकें।
अदालत में इस अर्जी पर अगली सुनवाई के दौरान विचार किया जा सकता है।