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सीडीएस : चाक चौबंद सुरक्षा सुनिश्चित

भाजपा ने वर्ष 2019 का आम चुनाव राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा को और चाकचौबंध करने के वादे के साथ लड़ा था। पार्टी ने सरकार बनने के बाद इस वादे पर काम भी किया है। तीनों सेनाओं की एकीकृत कमान यानी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति इसी दिशा में एक प्रयास कहा जा सकता है। भारतीय सेना के तीनों अंग दुनिया के सबसे ताकतवर मनोबल वाले सैन्य संगठन हैं, इनके बीच समन्वय की कमी भी नहीं देखी गई। लेकिन अब बढ़ती सैन्य जरूरतों के बीच अगर एकीकृत कमान का स्वरूप खड़ा किया गया है, तो आशा की जानी चाहिए कि सेनाएं और प्रबल व सक्षम होकर दुश्मन की हर कोशिश का मुंहतोड़ जवाब देंगी। रिटायर्ड जनरल बिपिन रावत ने सीडीएस के तौर पर अपना पद संभालने के बाद इसी का वादा किया है। उनका कहना है कि तीनों सेनाओं को मिलाकर तीन का समूह नहीं अपितु उसे पांच या सात करने पर जोर रहेगा। जाहिर है, वे सेनाओं की ताकत को पांच या सात या उससे भी ज्यादा के समूह में बदलने की बात कह रहे हैं।

जनरल रावत का कहना है कि आर्मी, नेवी और एयरफोर्स समन्वय व टीम वर्क के तहत काम करेंगी और उस पर नजर रखने का काम सीडीएस का होगा। जनरल रावत का बतौर सेना प्रमुख कार्यकाल बेहतरीन तो रहा लेकिन सेवानिवृति से ठीक पहले नागरिकता संशोधन कानून को लेकर हुए प्रदर्शन और हिंसा पर दिये उनके बयान पर काफी चर्चा रही। विपक्ष ने उन्हें अपनी सीमाओं में रहने की नसीहत भी दी और पूछा था अगर सेना के भीतर ही नेतृत्व पर सवाल उठे तो फिर सेना का अनुशासन कैसे कायम रहेगा। बहरहाल जनरल रावत के बयान को जिस तरह से आंका गया, संभव है उनकी मंशा वैसी न भी रही हो।

अब उनकी सर्वोच्च पद पर नियुक्ति को लेकर विपक्ष खासकर कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार के प्रति विशेष लगाव की वजह से उन्हें सीडीएस बनाया गया है। वहीं पार्टी के एक सांसद ने भी आरोप मढ़ा है कि यह सरकार का गलत कदम है। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि क्या यह कांग्रेस का अधिकारिक बयान है या नहीं। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद खुल कर सरकार का विरोध करने वाली कांग्रेस के नेताओं के बयान संयुक्त राष्ट्र तक में सुने गए हैं। भाजपा का आरोप है कि यह सब पाकिस्तान के सौजन्य से हुआ। जाहिर है, भारत की आंतरिक राजनीति में तो विद्वेष जंग की तरह लग ही चुका है, यह विदेश और रक्षा जैसे संवेदनशील मसलों को भी प्रभावित करने में लगा है।

सेना एक गैर राजनीतिक संस्था है, इसमें कोई दो राय नहीं है। सेना उस समय भी अनुशासित होकर ही कार्यरत थी जब दशकों तक कांग्रेस का शासनकाल रहा। अब बढ़ती सैन्य आवश्यकताओं के मद्देनजर अगर भाजपा शासित केंद्र सरकार ने सीडीएस की नियुक्ति की है तो कांग्रेस को इसमें भी दाल में काला नजर आ रहा है। आखिर बहुमत से निर्वाचित एक सरकार को निर्णय लेने से विपक्ष कैसे रोक सकता है, बेशक आलोचना का उसका अधिकार है।

एकीकृत कमांडर की नियुक्ति से तीनों सेनाओं के बीच समन्वय और मजबूत होने की आशा की जा सकती है। तीनों सेनाओं के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा, उनके बीच साझा सैन्य अभ्यास होने से और सामरिक दृढ़ता आएगी। नए दौर में पाकिस्तान और चीन से भारत को सामरिक चुनौतियों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह तो मानना ही होगा कि सीडीएस को ताकतवर पद बनाकर मोदी सरकार ने दुश्मनों को कड़ा संदेश दिया है। गौरतलब है कि युद्ध के दौरान सिंगल प्वॉइंट आदेश देने का अधिकार भी सीडीएस के पास होगा। कारगिल युद्ध के बाद बनी कमेटी ने इस पद को स्वरूप देने की सिफारिश की थी।

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