राज्यसभा की रेस से बाहर हुए आनंद शर्मा; छलका 'सियासी दर्द'—कहा, "राजनीति में सच बोलना अपराध है"

राज्यसभा की रेस से बाहर हुए आनंद शर्मा; छलका 'सियासी दर्द'—कहा, "राजनीति में सच बोलना अपराध है"

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Anand Sharma drops out of Rajya Sabha race,

शिमला। Anand Sharma drops out of Rajya Sabha race, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा को राज्यसभा प्रत्याशी नहीं बनाया। नामांकन से ठीक दो दिन पहले मंगलवार को आनंद शर्मा हिमाचल आए थे। पहले दिन वह कसौली में रुके थे, जबकि बुधवार को वह अपने घर शिमला पहुंचे थे। वीरवार को दोपहर बाद दिल्ली के लिए लौट गए।

शिमला में वह न तो मुख्यमंत्री से मिले न ही नामांकन पत्र दाखिल करने के दौरान मौजूद रहे। प्रत्याशी न बनाने का दर्द इनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे निराश नहीं हैं न ही इस पर कोई टिप्पणी करना चाहते हैं। पार्टी आलाकमान ही बता सकता है कि यह निर्णय किस के कहने पर लिया गया है।

राजनीति में आत्मसम्मान बहुत महंगा

आनंद शर्मा ने कहा कि राजनीति में आत्मसम्मान बहुत महंगा होता है। राजनीति में सच बोलना अपराध व अभिशाप समझा जाता है। सोनिया गांधी द्वारा उनके नाम की सिफारिश करने के संबंध में पूछे सवाल पर आनंद शर्मा ने कहा कि उम्मीदवारी तय करने का अधिकार जिन लोगों के पास है, वही इस फैसले की वजह बता सकते हैं।

इंदिरा गांधी का समय भी देखा

उन्होंने कहा कि उन्हें गर्व है कि कई दशकों तक उन्होंने देश व प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। कई बड़ी परियोजनाएं हिमाचल के लिए लेकर आए। उन्होंने कहा कि मैंने राजनीति में इंदिरा गांधी का समय भी देखा है। राजीव गांधी, सोनिया गांधी, डा. मनमोहन सिंह के साथ काम करने का मौका मिला है। 

सच बोलने से कोई नहीं रोक सकता

उन्होंने कहा कि हिमाचल मेरा घर है और हमेशा यहां आते हैं। वह प्रदेश के लोगों के साथ रहेंगे और सच बोलने से कभी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने तल्ख शब्दों में कहा कि आनंद शर्मा को सच बोलने से कोई नहीं रोक सकता। पार्टी द्वारा उन्हें प्रत्याशी न बनाने के मामले को वह पार्टी हाईकमान के पास नहीं ले जाएंगे। न ही वह इस विषय पर हाईकमान से कोई बात करेंगे।

जी-23 में थे शामिल

कांग्रेस के बड़े नेताओं के एक पत्र से काफी सियासी हलचल हुई थी। कांग्रेस में जी 23 यानी 23 वरिष्ठ नेताओं के एक समूह ने पार्टी की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी में बड़े बदलाव की पैरवी की थी। पत्र में संगठनात्मक चुनाव और सक्रिय नेतृत्व की मांग रखने के अलावा आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही की वकालत की थी। इससे पार्टी में काफी हलचल हुई थी।