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मानसिक शक्ति से ही होती है अनुभूति: मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार –

मानसिक शक्ति से ही होती है अनुभूति: मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार –

चंडीगढ़। मन बच्चे की तरह होना चाहिए, मन बच्चे की तरह होना चाहिए मन और मानसिक शक्ति का प्रज्ञा के साथ जब मेल होता है तभी होती है जीवन में महान लक्ष्यों की प्राप्ति कुछ ऐसी ही है। भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न होता है मनुष्य। वह इन शक्तियों को प्रयोग में ला सकता है। उनके उचित प्रयोग द्वारा वह वांछित परिणामों को पा सकता है। बाल्यावस्था में शरीर मन के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। मन अधिक सुगमतापूर्वक शरीर से अपने आदेशों का पालन करवा सकता है। बाद में जब बच्चे में विभिन्न आदतों का विकास हो जाता है, तो मन और शरीर पहले की भांति सामंजस्य के साथ कार्य नहीं करते हैं। एक बच्चे की तरह हमारा शरीर मन के नियंत्रण में होना चाहिए। आपकी इच्छा सदैव प्रज्ञा द्वारा निर्देशित होनी चाहिए। एक-दूसरे के बिना कोई भी कार्य संभव नहीं हो सकता है। यदि आपके पास प्रज्ञा है, लेकिन इसके निर्देशों का पालन करने के लिए पर्याप्त इच्छा नहीं है, तो यह आपके लिए कल्याणकारी नहीं है। यदि आपके पास दृढ़ इच्छा है, लेकिन प्रज्ञा नहीं है तो लक्ष्य को चूकने और अपना नाश करने की पूरी आशंका है। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 24सी अणुव्रत भवन में सभा को संबोधित करते हुए कहे। मनीषी संत ने आगे कहा ज्ञान एवं इच्छा तन एवं मन को नियंत्रित करती हैं। ज्ञान आत्मा का अंतज्र्ञानात्मक सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान है। युद्ध के समय लक्ष्य-दूरी मापक यंत्र को यह निर्धारित करने के लिए उपयोग किया जाता है कि गोला कहां दागना है। जब दूरी का पता चल जाता है, तो बंदूकें प्रभावशाली ढंग से चलाई जा सकती है। प्रज्ञा आपका दूरी मापक यंत्र है और इच्छा आपकी मारक शक्ति है, जो प्रज्ञा के आदेशानुसार आपके लक्ष्य को भेदती है। शरीर केवल संवेदनाओं का एक पुंज है। संवेदनाओं को अपने से अलग करना आसान नहीं है, लेकिन हमें निरंतर इस चेतना में रहना चाहिए कि आत्मा के रूप में परमात्मा हमारे साथ हैं। जब मन, शरीर एवं उसकी मांगों के पूर्णत: अधीन होता है, जैसे कि अधिकतर लोगों के साथ होता है, तो मन को शरीर से अलग करने का अ यास करना चाहिए। आरंभ में धीरे-धीरे छोटी-छोटी वस्तुओं से मन को अलग करना उत्तम होता है। दिव्य चेतना में आपको यह अनुभव होता है कि आत्मा रूप में आपके कोई हाथ, पैर, आंखें अथवा कान नहीं हैं और न ही आपको इन शारीरिक अंगों की आवश्यकता है, फिर भी आप इन शारीरिक अंगों का उपयोग कर सकते हैं। केवल मानसिक शक्ति के द्वारा सुनना, देखना, सूंघना, चखना एवं स्पर्श करना संभव है। अनेक संत ईश्वर की वाणी अपने कानों से नहीं अपने मन से सुनते हैं। चेतना की ऐसी अवस्था काल्पनिक नहीं है, बल्कि एक वास्तविक अनुभव है। यह आपका अनुभव नहीं हो सकता, जब तक कि आप ध्यान न करें। यदि आप अत्यधिक भक्ति के साथ ध्यान करें, तो किसी दिन जब आपको इसकी तनिक-सी भी आशा नहीं होगी, आपको भी वही अनुभव होगा। मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया मूल्यों की उत्कृष्टता और निकृष्टता समाज के ऊपर निर्भर करती हैं, परंतु समाज में जो भी मूल्य प्रभावी होंगे, वही हमें प्रेरित एवं प्रभावित करते हैं। समाज हमारी प्रेरणा का प्रमुख केंद्र है। स्वतंत्रता आंदोलन में वीर बलिदानियों की लंबी सूची है। ये शहीद भारतमाता के चरणों में अपने जीवन को खुशी-खुशी इसी कारण उत्सर्ग कर सके, क्योंकि राष्ट्र के प्रति अपार प्रेम ही उन्हें इस ओर प्रेरित करता रहा। उनकी प्रेरणा कभी कमजोर नहीं पड़ी और वे कभी दुर्बल नहीं हुए। आज समाज में धन की सर्वोपरि प्रतिष्ठा है। इसलिए यह प्रतिष्ठा हमारी प्रेरणा बन गई है।
धन उपार्जित करना बुरी बात नहीं है। धन उपार्जन करना चाहिए, परंतु इसके लिए नैतिक मूल्यों को ताक में रखकर नहीं। आज अधिकांश लोग केवल किसी भी प्रकार से रातोंरात धनवान हो जाने की कार्ययोजना को क्रियान्वित करने में जुटे हैं। यहां पर जो चीज उन्हें प्रेरित कर रही है, वह है धन, लेकिन याद रखें धन से आप सुख-सुविधाएं और वस्तुएं खरीद सकते हैं, लेकिन शांति नहीं खरीद सकते।

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