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राग और द्वेष रूपी भाव ही कर्म बन्ध के कारण है: मुनि विभंजन सागर –

श्री दिगम्बर जैन ,अतिशय क्षेत्र ,बांधपुर ,जिला ललितपुर (उ. प्र.) में श्रमण श्री विभंजनसागर जी मुनिराज एवं श्रमण श्री विश्वाक्षसागर जी मुनिराज विराजमान है। आज मुनिश्री ने प्रवचनसार ग्रन्थ की वाचना में बताया कि पञ्च परमेष्ठी व्यवहार नय से वंदनीय है ।निज शुद्धात्मा निश्चय नय से वंदनीय है और ये परम् शुद्ध निश्चय नय से न कोई बन्ध है न वंदनीय है। यहाँ पर वीतराग और सराग इन दोनों चरित्रों के इष्ट और अनिष्ट की व्याख्या की जा रही है ।एक जैसे क्रिया ,एक जैसी प्रवृत्तति होने पर भी फल एक सा नहीं होता। क्रिया एक सी हो सकती है, प्रवृत्ति एक सी हो सकती है पर भावो की परिणति एक सी नहीं होती है। एक जीव की वंदना स्वर्ग भेज रही है ,एक जीव की वंदना भवन्त्र में भेज रही है ,दोनों वंदना कर रहे है ।वे ही अर्हंत है, वे ही सिद्ध है, वे ही आचार्य ,उपाध्याय, साधु है परमेष्ठी के गुणों में कोई अंतर नहीं है, परमेष्ठी के स्वभाव में कोई अंतर नहीं है ,लेकिन वंदना करने वाले जीव की परिणति का परिणाम देखिये भिन्न -भिन्न है।आप परमेष्ठी में दोष मत खोजना ,परमात्मा में दोष मत खोजना। जिन में कृत्रित दृष्टि है वे भगवान नहीं होते है ,जिनमे भूखत्रित दृष्टि है वे भगवान नहीं होते है और जो भगवान होते है कर्ता, भोक्ता दृष्टि से शून्य होते है ।
मुनिश्री ने बताया कि आप अपने सुख दुःख को देखकर के भगवान में कृत्रित को मत लाइए ।ये क्यों नहीं कहते हो की जो स्वर्ग गया है उसने सम्यक्त्व सहित आराधना की थी सो स्वर्ग चला गया और जिसने मिथ्यात्व सहित आराधना की थी वो देव दुर्गति हो गई उसकी। हमारी साधना न देव गति के लिए हो, न देव दुर्गति के लिए हो ,साधना हमारी गति दुर्गति से रहित होने के लिए हो ,सिद्धान्त के लिए हो ।ये तो वंदना के लिए कहा गया है।
मुनिश्री ने बताया बस्तु कर्म बन्ध का कारण नहीं होती है ,व्यक्ति कर्म बन्ध का कारण नहीं होता है कर्म बन्ध का कारण राग और द्वेष रूपी हमारे भाव, हमारे परीणाम हुआ करते है, हमारी जैसी परिणति होती है ,जैसे भाव होते है ।इसलिये सबसे पहले अपने भावो को अच्छा करने की जरूरत है ।एक मुनि अपनी साधना करके चक्रवर्ती हो रहा है ,एक राजा हो रहा है और एक सर्वार्थ सिद्धि में देव हो रहा है इर एक अपने कर्मो का क्षय करके निर्वाण पद की प्राप्ति कर रहा है। चारित्र के फल से ही सब कुछ होता है जबकि रत्नत्रय तो निर्वाण का ही हेतु है लेकिन उस मुनि पद में जो जैसे अपने भाव बनाता है वह वैसी परिणति और वैसे भव को प्राप्त कर लेता है ।
मुनिश्री ने बताया जो श्रावक के व्रतो की व्याख्या है वह प्रवृत्ति मुलक है। प्रवृत्ति की प्रधानता से पुण्य आस्रव में रखा और निरग्रंथ की जो प्रवृत्ति है वह जगत की प्रवृत्ति से निरवृत्ति भूत है इसलिए संवर में रखा। यदि कोई जीव व्रत को स्वर्ग जाने के लिए धारण करता है ,कोई आकांक्षा से धारण कर रहा है तो आस्रव का कारण है। जिस जीव ने व्रत को मात्र पाप की प्रवृत्ति के लिए स्वीकार किया है कोई लक्ष्य नहीं है ,विधि पूर्वक इच्छा का दमन किया है और इच्छा पूर्वक धारण किया है ,तीन बातो को ध्यान रखना- 1. सादी नहीं हो रही थी इसलिए व्रत लिया
2. समाज में प्रतिष्ठा मिल जायेगी इसलिये व्रत लिया
3. लोगो ने आपको ब्रह्मचारी कहना प्रारम्भ कर दिया था इसलिये व्रती बन गए।
ये तीन बिन्दु सामने आये आचार्य उमा स्वामी, आचार्य कुन्द कुन्द स्वामी इनको व्रती स्वीकार नहीं करते।
मुनिश्री ने बताया हिंसा ,झूठ ,चोरी, कुशील ,परिग्रह इनका छोड़ना व्रत नहीं है इनसे विरक्ति का होना व्रत है और जो विरक्ति पूर्वक छोड़ेगा वह व्रती है। कौन? जो बुद्धि पूर्वक छोड़ेगा ।ध्यान रखना जिनागम कहता है ‘रत्तो बंदधि कम्म्म’ अर्थात राग बन्ध का कारण है । जीने का राग भी राग ही है कोई मोक्ष नहीं है, कोई वैराग नहीं है। जीने के राग के कारण तूने सब छोड़ा है न की त्याग के लिए सब छोड़ा है ।डॉ. में कह दिया ये बस्तु नहीं खाना ,इतना खाना ,इससे ज्यादा मत खाना ,काम ,भोग ,विकार भावो को छोड़ देना अब तुम्हारी सामर्थ नहीं है। यदि तुमने इनको नहीं छोड़ा तो तुम्हारा मरण हो जायेगा। जीने का राग था वो राग ने काम, भोग, वाशना छुड़ा दी । ये जीव जीने के राग के लिए छोड़ रहा है इसलिए तुम कितना ही छोड़ देना ,ये जीने का राग जो बैठा हुआ है वह बन्ध करा रहा है। व्रती बनना भी बड़ा तात्विक है ,सत्य तत्व निर्णय किये बिना व्रती बन भी गये तो सत्य तत्व दृष्टि को प्राप्त नहीं कर सकोगे। अब व्रती भी बनना होगा तो निर्णय करना पड़ेगा। वर्ति बना है जीव अब यहाँ आपको तत्व निर्णय करके ,तत्व में लीन होकर, तत्व की प्राप्ति के लिए जो व्रत स्वीकार करता है वही व्रती है। तत्व का निर्णय किया कि मैं आत्म द्रव्य हूँ ,स्वतंत्र हूँ। तत्व निर्णय किया है कि पर द्रव्य से में भिन्न हूँ तत्व में लीन होने के लिए ,निज स्वरूप में लीन होने के लिये और तत्व की प्राप्ति के लिए अंतिम तत्व मोक्ष तत्व की प्राप्ति के लिए जिसने स्वीकार किया व्रतों को उसका नाम व्रती है। ऐसे व्रत को आस्रव में मत डालना ,व्रत संवर का कारण भी है और वही व्रत निर्जरा का कारण भी बन जाता है जब साधना उत्कृष्ट होती है और उन्हीं व्रतों के माध्यम से वह एक दिन कर्मो का क्षय करके निर्वाण पद की प्राप्ति भी करता है।

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