‘मेरा न कोई, मैं न किसी का...’ : श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के अनन्य भाव का सार है स्वामी आगमानंद जी की प्रसिद्ध कविता
‘I belong to no one, and no one belongs to me...’
भागलपुर। ‘I belong to no one, and no one belongs to me...’ भागलपुर (नवगछिया) के नगरह गांव में जन्मे जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री रामचंद्राचार्य परमहंस स्वामी आगमानंद जी महाराज, जिन्हें स्थानीय लोग “नगरह के रामू बाबा” के नाम से भी जानते हैं, आज सनातन परंपरा के एक प्रमुख यायावर संत के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी एक छोटी-सी चार पंक्ति की रचना वर्षों से उनके विचार दर्शन की पहचान बन चुकी है— “मैं हूं जिसका, मेरा वही है, मैं हूं जिसमें, मुझमें वही है, मेरा न कोई, मैं न किसी का, मेरा जो होता, मैं हूं उसी का।” यह रचना उनके आध्यात्मिक चिंतन और आत्मबोध को दर्शाती है।
श्रीरामचरितमानस में समान भाव (तुलसीदास जी)
मानस में भगवान राम और उनके भक्तों के बीच के इस संबंध को कई जगह इसी रूप में दिखाया गया है, जहां जीव कहता है कि 'मैं केवल उसी का हूं':
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किष्किंधा कांड (शरणागति का भाव):
जब विभीषण भगवान राम की शरण में आते हैं, तो भगवान राम उनके माध्यम से हर भक्त के लिए यही बात कहते हैं:
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥" और आगे भक्त के भाव के लिए कहा गया है: "मोरें प्रौढ़ तेंइ जाकें, असि मति डोल न कबहीं काकें।" यानी जिसके मन में यह दृढ़ विश्वास है कि 'मैं सिर्फ भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं', वही मुझे पाता है।
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अरण्य कांड (लक्ष्मण-गीता):
लक्ष्मण जी जब भगवान राम से ज्ञान, वैराग्य और माया के बारे में पूछते हैं, तो प्रभु जीव की परिभाषा देते हुए कहते हैं:
"ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥" इसका अर्थ भी यही है कि "मैं जिसमें हूं, मुझमें वही है"—यानी ईश्वर का अंश ही जीव है, दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में समान भाव (श्रीकृष्ण)
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए हैं, उनमें स्वामी जी की कविता की आखिरी दो लाइनों ("मेरा जो होता, मैं हूं उसी का") का हूबहू दर्शन मिलता है।
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अध्याय 9, श्लोक 29 (समभाव और अनन्य भक्ति):
श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं सबमें हूं और जो मुझमें है, मैं उसी का हूं: समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ अर्थ: "मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूं, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय। परंतु जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूं।" (यह स्वामी आगमानंद जी की पंक्ति 'मैं हूं जिसमें, मुझमें वही है' का सीधा अनुवाद जैसा है)।
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अध्याय 7, श्लोक 17 (ज्ञानी भक्त का भाव):
"प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥" अर्थ: "ज्ञानी भक्त को मैं अत्यंत प्रिय हूं और वह मुझे अत्यंत प्रिय है।" यानी जो मेरा हो जाता है, मैं उसी का हो जाता हूं।
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अध्याय 18, श्लोक 66 (सर्वोच्च शरणागति):
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" अर्थ: "सब धर्मों को छोड़कर तुम केवल मेरी शरण में आ जाओ (यानी यह मान लो कि मेरा न कोई, मैं न किसी का, बस केवल तुम्हारा)।"
विचार दर्शन की पहचान
स्वामी आगमानंद जी महाराज ने अपनी चार लाइनों की इस कविता में गीता के 'मयि ते तेषु चाप्यहम्' (वे मुझमें हैं, मैं उनमें हूं) के पूरे दर्शन को बहुत ही सरल हिंदी में पिरो दिया है। यही कारण है कि यह पंक्तियां सुनते ही सीधे दिल में उतर जाती हैं और वर्षों से उनके विचार दर्शन की पहचान बनी हुई हैं।
नगरह (नवगछिया) में हुआ जन्म, बचपन से आध्यात्मिक झुकाव
स्वामी आगमानंद जी महाराज का जन्म भागलपुर जिले के नवगछिया क्षेत्र के नगरह गांव में हुआ। प्रारंभिक जीवन में उन्हें “रामू बाबा” के नाम से भी जाना जाता था। बचपन से ही उनका रुझान आध्यात्मिकता और धार्मिक विचारों की ओर था, जिसने आगे चलकर उनके जीवन की दिशा तय की।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा
रामू बाबा का जन्म यदुनंदन पांडेय और राधा देवी के परिवार में हुआ था। वे अपने परिवार में सबसे बड़े हैं, वे तीन भाई एवं एक बहन हैं। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा नवगछिया और भागलपुर क्षेत्र में प्राप्त की तथा तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की।
श्री शिवशक्ति योगपीठ और अयोध्या मठ से जुड़ा दायित्व
वे वर्तमान में श्री शिवशक्ति योगपीठ, नवगछिया के पीठाधीश्वर हैं। इसके साथ ही वे श्री उत्तरतोताद्रि मठ, विभीषणकुंड (अयोध्या) के उत्तराधिकारी भी हैं। इन धार्मिक संस्थानों के माध्यम से वे सनातन परंपरा, योग और आध्यात्मिक साधना का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
यायावर संत के रूप में देश-विदेश में पहचान
वे किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते, बल्कि देशभर में भ्रमण करते हुए सत्संग और धार्मिक प्रवचन के माध्यम से लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं। इसी कारण उन्हें “यायावर संत” कहा जाता है। उनके साधक, शिष्य और अनुयायियों की संख्या लाखों में है। देश के हर कोने में उनके भक्त मिलते हैं, जबकि विदेशों में भी उनके अनेक अनुयायी हैं। अब तक वे नौ लाख से अधिक शिष्यों को आध्यात्मिक दीक्षा दे चुके हैं।
गुरु पूर्णिमा उत्सव 2026 का आयोजन सहरसा में
वर्ष 2026 में गुरु पूर्णिमा उत्सव का भव्य आयोजन सहरसा में किया जाएगा। गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को है और इसे आषाढ़ पूर्णिमा तथा गुरु व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर दो दिवसीय कार्यक्रम 28 और 29 जुलाई को आयोजित होगा।
28 जुलाई को पूजन कार्यक्रम के साथ नए शिष्यों को स्वामी आगमानंद जी महाराज द्वारा आध्यात्मिक दीक्षा दी जाएगी। इस आयोजन की तैयारी अभी से प्रारंभ कर दी गई है। यह आयोजन उत्सव समिति सहरसा, श्री शिवशक्ति योगपीठ नवगछिया और श्री उत्तरतोताद्रि मठ विभीषणकुंड अयोध्या के तत्वावधान में होगा।
आध्यात्मिक संदेश और समाज पर प्रभाव
स्वामी आगमानंद जी महाराज के प्रवचनों का मुख्य केंद्र सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्य और आत्मबोध है। उनकी शिक्षाएं और रचनाएं लाखों लोगों को आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करती हैं। उनकी रचना “मैं हूं जिसका…” उनके दर्शन का सार मानी जाती है।
साधना, सेवा और सनातन धर्म
नगरह गांव से निकलकर देश-विदेश तक पहचान बनाने वाले स्वामी आगमानंद जी महाराज आज एक प्रतिष्ठित यायावर संत और आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्थापित हैं। उनका जीवन साधना, सेवा और सनातन धर्म के प्रचार को समर्पित है। आगामी गुरु पूर्णिमा उत्सव 2026 उनके अनुयायियों के लिए विशेष महत्व रखने वाला आयोजन होगा।