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पंजाब में इस जगह खुद प्रकट हुए भोलेनाथ - Nalas Shiv Mandir Rajpura Punjab

पंजाब में इस जगह खुद प्रकट हुए भोलेनाथ, दर्शन पाने को लग रही है लोगों की भीड़

Nalas Shiv Mandir Rajpura Punjab : भगवान भोलेशंकर की महिमा का वर्णन जितना भी किया जाए वो बेहद कम है। देवों के देव महादेव इतने कृपालु और दयालु हैं कि बस कुछ पूछों ना। भगवान भोलेनाथ एक ऐसे भगवान है जिन्हें अपने भक्त से कुछ खास नहीं चाहिए। उन्हें बस अपने भक्त से उनके प्रति श्रद्धा-सुमन और नित-नियमित भावना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा हो सके तो बस वह एक लोटा जल चढ़ा दे। इतने में भोले प्रसन्न हैं और उस भक्त का कल्याण फटाफट कर देते हैं। बाबा भोले में एक खासियत और है कि वो किसी को कुछ भी देने में सोचते नहीं। अगर वह प्रसन्न हैं तो उनसे कुछ भी ले लो।

Nalas Shiv Mandir Rajpura Punjab

खास बात यह है कि भोलेनाथ प्रसन्न भी बड़ी जल्दी होते हैं और जिसके ऊपर प्रसन्न हैं उसकी बिगड़ी बनने में फिर देर नहीं लगती है। पल में वह रंक से राजा हो जाता है। यहां एक बात और है कि जितनी जल्दी भोले खुश होते हैं उतनी जल्दी ही उनको गुस्सा भी आता है। भोले को अन्याय करने वाले, अधर्मी, अकर्मी, अहंकारी कतई पसंद नहीं है। भोले के मन को वो भक्त भाता है जिसके मन में सच्चाई होती है जो सेवाभाव रखता है। चलो अब ये तो थी भोलेबाबा के बारे में चर्चा। अब आपको भोलेनाथ के एक ऐसे धाम से रूबरू कराते हैं जहां बाबा खुद प्रकट हुए हैं। हालांकि, बाबा शिव के अनेकोनेक धाम ऐसे हैं जहां पर बाबा खुद से विराजे हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तर भारत के पंजाब राज्य में एक जगह पर भोलेनाथ खुद से प्रकट हुए हैं।

दरअसल, वो जगह है राजपुरा के पास नलास। जी हां नलास में महादेव खुद से प्रकट हुए हैं। बाबा के प्रकट होने के पीछे एक लंबी कहानी है। सन 1500 की बात है जब भोलेनाथ ने यहां अपने दर्शन दिए थे। 500 वर्ष पूर्व यहां पर झाड़ियों में भोलेनाथ शिवलिंग रूप में सामने आए थे। जिसके बाद जय-जयकार के साथ भगवान भोलेनाथ की इस अपरंपार महिमा को मंदिर के रूप में संजोया गया।

यही है वो शिवलिंग जो खुद प्रकट हुई….Nalas Shiv Mandir Rajpura Punjab

जानिए कैसे प्रकट हुई शिवलिंग… एक गाय से जुड़ी पूरी प्रक्रिया…

यहां पर शिवलिंग उत्पत्ति की गाथा बताती है कि सन 1500 में नलास जंगल रूप में था। नलास उस वक्त झाड़ियों और घास में समाहित हो रखा था। बेहद शांत वातावरण रहता था। गाथा के अनुसार, उस समय कुछ चरवाहे अपनी गायों को लेकर यहां कुछ समय चराने के लिए आया करते थे। यहां चरने आने वालीं गायों में एक गाय ऐसी थी कि जब वह चरकर घर वापस जाने को होती तो एक झाड़ियों के पास जाकर के खड़ी हो जाती थी और यहां उसके थनों से दूध की धार अपनेआप निकलना शुरू हो जाती थी और फिर जब उसका दूध खाली हो जाता था तो वह घर को चल देती थी। अब जब वह दूध झाड़ियों में निकाल आई है तो फिर घर में क्या देगी। जहां यह देख गाय वाला बेहद परेशान था ऐसे कैसे हो जाता है और वो भी रोज। जिसके चलते गाय वाला जब दोबारा गाय को चराने ले गया तो उसने उसपर पूरी नजर रखी। उसके नजर रखने के दौरान भी वही हुआ जो होता चला आ रहा था यानि कि गाय घर जाने से पहले फिर वहीं झाड़ियों के पास पहुँची और उसके पहुँचते ही उसके थनों से दूध की धार निकलनी शुरू हो गई। यह देख गायवाला को पता तो लग गया कि उसका दूध खत्म कैसे हो जाता है लेकिन जिसप्रकार खत्म हो रहा था उसे देखकर वह हक्काबक्का रह गया। एक तरफ जहां उसे आश्चर्य हुआ वहीं दूसरी तरफ उसने यह जानने की सोची कि यहां खुद से गाय का दूध कैसे निकल जाता है। आखिर क्या है इन झाड़ियों में।

करिये चमत्कारी शिवलिंग के दर्शन…

कुल्हाड़ी लेकर छांटने लगा झाड़ियां…

गाथा के अनुसार, गायवाला उन झाड़ियों को छांटने लगा जहां पर उसकी गाय अपनेआप दूध निकाल रही थी। कहते हैं कि वह जब कुल्हाड़ी चला रहा था तो उसके कुल्हाड़ी का एक प्रहार वहां मौजूद शिवलिंग पर हुआ। जहां प्रहार होते ही शिवलिंग को चोट पहुंची और इससे आकाश में बड़ी तेजी से बिजली की गड़गड़ाहट हुई और इस गड़गड़ाहट से कुछ दूरी पर वट वृक्ष के नीचे तपस्या कर रहे स्वामी कर्मगिरी जी की तपस्या भंग हो गई और वह जाग उठे। इधर, शिवलिंग के बारे में जान गायवाले और उसके साथ मौजूद अन्य घबरा गए और अनजाने में कुल्हाड़ी से किये गए प्रहार के लिए क्षमा मांगी। वहीं, बताया जाता है कि उस रात शिवलिंग के बारे में उस समय के पटियाला के राजा को भी सपना आया जिसमे राजा से मंदिर में निर्माण करवाने को कहा गया। बताते हैं कि राजा से कहा गया कि वह सुबह अपना एक हाथी छोड़ दें। वह हाथी जिस जगह पर जाकर रुकेगा वहीं मंदिर बनवाना है। इधर राजा ने वैसा ही किया जैसा उनसे कहा गया था।अगली सुबह महाराज पटियाला ने अपना हाथी छोड़ दिया और स्वयं उसके पीछे चल पड़े। जहाँ स्वंय  शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी। वहीं आकर हाथी रुक गया। जिसके बाद महाराज पटियाला ने उस जगह मन्दिर का निर्माण करवाया। मन्दिर का निर्माण पूरा होने पर मन्दिर को कर्म गिरी जी महाराज जो कि शिवलिंग उतपत्ति वाली जगह के पास ही तपस्या कर रहे थे उनके सपूर्द कर दिया। इस मंदिर का नाम शानालेश्वर महादेव शिव मन्दिर नलास एवं यह नलास महादेव के नाम से भी प्रसिद्व है। कहते हैं या शिव कैलाश में , या शिव नलास में।।

गाय के थनों से गिरते दूध का चित्रण …

लगता है मंदिर में भक्तों का तांता…

नलास महादेव(Nalas Shiv Mandir Rajpura Punjab) ने अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण की है। भक्तों को मनवांछित फल दिया। भक्त यहां दौड़े-दौड़े आते हैं और अपनी हर मुराद को बाबा को बताकर पूरी कर लेते हैं। मंदिर में काफी दूर-दूर से भक्त आते हैं और तांता लगा रहता है। कहते हैं कि नलास महादेव से की गई विनती, मुराद खाली नहीं जाती। इसलिए अगर आप अबतक नहीं गए हैं तो अब जरूर जाएं। अबतो आपको मंदिर के बारे में पता भी चल गया है।

बतादें कि नलास महादेव का मंदिर(Nalas Shiv Mandir Rajpura Punjab) बड़ा भव्य बना हुआ है।मंदिर के प्रांगण में 140 फुट ऊंचा त्रिशूल स्थापित किया गया है। इसी स्थान पर भगवान शिवजी की 108 फुट ऊंची स्थापित है। इसके अलावा मंदिर प्रांगण में 500 वर्ष से अधिक पुराना वट वृक्ष भी मौजूद है जिसके नीचे कर्म गिरी जी महाराज ने तपस्या की थी। यहां इस पेड़ पर लाल धागा (मौली) बांधकर मन्नत मांगने की भी मान्यता है। ऐसा करने से भोले बाबा उसकी इच्छा अवश्य पूरी करते हैं। वहीं आज भी शिवलिंग पर कुल्हाड़ी के प्रहार का निशान पाया जाता है। वाकई भगवान शिव ने चमत्कार दिखाया है और इस नलास शिव मंदिर में आकर जो भी श्रद्धा-भाव समर्पण कर दर्शन करता है उसके जीवन में भी चमत्कार लाजमी हो जाता है।

Written and Posted by Shiva Tiwari

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