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चरित्र बिना जीवन जैसे रीढ़ की हड्डी के बगैर शरीर : मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक

संस्कृति वस्त्रों में नहीं, बल्कि चरित्र के विकास में है। हमारे चरित्र का निर्माण हमारे विचार करते हैं। इसलिए चरित्र को बदलने के लिए विचारों को बदलना जरूरी होता है। असल में ज्ञान का सामान्य अर्थ जानकारी है, लेकिन वास्तविक ज्ञान आत्मज्ञान की जानकारी है। आत्मज्ञान ही वह अमृत है जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। व्यक्ति का चरित्र ही उसकी महानता की सच्ची कसौटी है। यानी उसके चरित्र की पूर्ति धन, यश, विद्वत्ता आदि में से कोई नहीं कर सकता। महान व्यक्ति अपने चरित्र की पवित्रता बनाए रखने के लिए हर तरह के त्याग के लिए हमेशा तैयार रहता है। चरित्र के बगैर व्यक्ति का जीवन वैसा ही है जैसे रीढ़ की हड्डी के बगैर शरीर। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 18सी गोयल भवन 1051 मे में कहे।

मनीषी संत ने कहा मनुष्य की महानता की पहचान उसके पद, अधिकार, ऐश्वर्य या धन-संपदा से नहीं, बल्कि उसकी विनम्रता, उदारता और कर्तव्य परायणता से होती है। स्वामी विवेकानंद के शरीर पर भगवा वस्त्र और पगड़ी को देखकर एक विदेशी व्यक्ति ने टिप्पणी की थी। यह आपकी कैसी संस्कृति है। तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है। कोट-पैंट जैसा कुछ भी पहनावा नहीं है। इस पर स्वामी जी मुस्कराए और बोले-हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से बिल्कुल अलग है। आपकी संस्कृति का निर्माण आपके दर्जी करते हैं, जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है।

मनीषी श्रीसंत ने कहा एक संत के पास उनका एक शिष्य आया और उनसे पूछा, मैं कौन हूं गुरुजी ने एक थाली में पानी भरकर कहा था इसमें अपना मुख देखोगे तो तुम अपना साक्षात्कार कर लोगे। जब शिष्य ने उसमें अपना मुख देखा तो उसे लगा कि वह अति सुंदर है, लेकिन अगले ही पल उसे महसूस हुआ कि समय के साथ उसके मुख का स्वरूप भी बदल जाएगा और तब वह इतना सुंदर नहीं रहेगा। उसी पल उसे अपने सुंदर मुख से घृणा होने लगी और वह यह बात समझ गया कि जो चीज कुछ समय बाद जीर्ण-क्षीण हो जाए वह उसका स्वरूप कैसे हो सकता है।

मनीषी श्रीसंत ने कहा हमारे भीतर हिंसा हर जगह से ठूसी जा रही है। टीवी हमें गुस्सैल बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हमारे नेता, युवा खिलाडिय़ों को नेशनल टेलीविजन पर गालियां देते सगर्व गुस्सा फेंकते दिखते हैं। कैसी दुनिया बुनते जा रहे हैं, हम. जरा-जरा सी बात पर हम मरने-मारने पर उतारू हुए जा रहे हैं। हमारे चेतन, अवचेतन मन पर हिंसा के दाग गहरे होते जा रहे हैं. हम हिंसा से भरते जा रहे हैं. हमारा गुस्सैल, हिंसा से भरते जाना पेड़ की जड़ कटने जैसा है. जैसे जड़ कटने का अहसास एक दिन में नहीं होता, वैसे ही हिंसा का दीमक कब भीतर से प्रेम, सद्भाव, संवेदना को चट करता जाता है, पता ही नहीं चलता! हमारे आसपास जो कुछ घट रहा है, जिस तेजी से घटा है, उस पर सजग दृष्टि रखना बहुत जरूरी है. अक्सर हम जिन चीजों से सहमत नहीं होते, उन्हें अनदेखा करते जाते हैं. हम उनसे खुद को बहुत दूर मानते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और होती है।

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