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किसके कारण यह शरीर चल-फिर रहा है?: निरंकारी बाबा

मायापती को जाने बिना, यह माया भी सुख देने वाली नहीं होती। प्रभु से मिले बिना इन्सान की आत्मा व्याकुल होकर भटकती रहती है। महात्मा कहते हैं-

कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आई मिल परभाति,
ज्यों नर बिछुरै राम सिउ ना दिन मिले न राति।

अन्धेरी रात में चकवे को चकवी की आवाज़ सुनाई देती है। सुनकर वह उस तरफ चला जाता है। फिर दूसरी तरफ से आवाज आती है तो उधर भाग खड़ा होता है। सारी रात वह भटकता है। जीवन में जब प्रभात होती है, आलोक फूटता है, उसकी भटकन समाप्त होती है। मनुष्य भी जब परम पिता परमात्मा से एक बार बिछुड़ जाता है तो उसका भटकना आरंभ हो जाता है।

उसकी भटकन तभी समाप्त होती है जब उसका नाता पुन: निराकार से जुड़ जाता है। अत: इस मूल प्रभु परमात्मा, इस हरि के साथ हमें अपना नाता जोड़े रखना है। अगर इसके साथ हम नाता जोड़े रखेंगे, तो हमारी आत्मा शान्त हो जाएगी, हमारे आवागमन के बन्धन समाप्त हो जायेंगे और हमारे मन में हर एक इन्सान के प्रति प्रेम की भावना जागृत होगी। हम हर एक इन्सान को अपना मानेंगे। किसी को पराया, किसी को बेगाना नहीं मानेंगे। हम कभी फिर अभिमान नहीं करेंगे। मनुष्य की अज्ञानता यह है कि वह अपने को शरीर ही माने बैठा है और मैं यह शरीर ही हूँ यह समझता है। यह शरीर तो हमेशा रहने वाला नहीं है। यह यतो पांच तत्वों का पुतला है।

जब इन पांच तत्वों से इस शरीर का नाता टूट जाता है तो शरीर का अन्त हो जाता है। मनुष्य शरीर तक ही सीमित है। वह तन को ही सब कुछ माने बैठा है। यही उसकी अज्ञानता है। उसके लिए यह समझना आवश्यक है कि वह कौन है? किसके कारण इस शरीर में हरकत है? किसके कारण यह शरीर चल-फिर रहा है? मनुष्य कहता है कि यह मेरा हाथ है, मेरा सिर है, मेरे पांव हैं, मेरी आँखें है, मेरे कान हैं। अगर मनुष्य शरीर है तो शरीर कहे कि मैं आँख हूं, मैं कान हूं, मैं सिर हूं आदि। लेकिन नहीं। जिस तरह हम मकान में रहते हैं तो हम यह नहीं कहते कि मैं मकान हूं, मैं अलमारी हू। हम मकान के बीच में रहते हैं। हम चेतन हैं। इसलिए मनुष्य को कहना चाहिए कि मैं शरीर में रहता हू। मनुष्य को इसी अज्ञानता को दूर करना होगा।
मनुष्य तब तक है, जब तक शरीर है। जब तक शरीर है, तब तक ही तो उसके अन्दर आत्मा का वास है। इस आत्मा को परम आत्मा से अपना नाता

जोड़ कर इस दूरी को समाप्त करना होगा। तभी सुख है, चैन है। तभी पार उतारा है।
तभी आवागमन के बन्धनों से छुटकारा है 7 जब तक आत्मा का परम सत्ता से मिलन नहीं हो जाता, मनुष्य इस तरह भटकता रहेगा 7 अत: मनुष्य के लिए यह जरुरी है कि वह परमसत्ता से अपना नाता जोड़ ले 7

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