समलैंगिकता अपराध है या नहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ा फैसला
Thursday, November 15, 2018
Breaking News
Home » देश » समलैंगिकता अपराध है या नहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ा फैसला
समलैंगिकता अपराध है या नहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ा फैसला

समलैंगिकता अपराध है या नहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ा फैसला

नई दिल्ली : देश में संमलैंगिगता अपराध है या नहीं इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने दो वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से होने वाले यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिये दायर याचिका सोमवार को संविधान पीठ के पास भेज दी थी | सीजेआई दीपक दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि संविधान की धारा-377 की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में आज फिर से बहस हो रही है

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 ‘ के अनुसार अगर कोई भी किसी पुरूष, महिला या पशु के साथ प्रकृति के विपरीत यौनाचार करता है तो इस अपराध के लिये उसे उम्र कैद की सजा होगी या एक निश्चित अवधि जो दस साल तक बढ़ाई जा सकती है और उस पर जुर्माना भी लगाया जायेगा|

आपको बता दे कि सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के फैसले को पलटते हुए एक ही लिंग के दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए रिलेशन को अपराध की श्रेणी में डाल दिया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं| चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुवाई में पांच जजों की बेंच इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है| बेंच में सीजेआई के अलावा जस्टिस रोहिंग्टन आर नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस इंदू मल्होत्रा शामिल हैं|

विवाह, संपत्ति, पैतृक अधिकारों पर विचार नहीं…

इसके साथ ही केंद्र ने उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया कि समलैंगिक विवाह, संपत्ति और पैतृक अधिकारों जैसे मुद्दों पर विचार न किया जाए क्योंकि इसके कई प्रतिकूल परिणाम होंगे। केंद्र ने साफ कहा कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए संबंधों से जुड़ी धारा 377 की वैधता के मसले को हम अदालत के विवेक पर छोड़ते हैं। उधर, उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वह खुद को इस बात पर विचार करने तक सीमित रखेगा कि धारा 377 दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए संबंधों को लेकर असंवैधानिक है या नहीं।

‘एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘हम कोर्ट पर छोड़ते हैं कि वह तय करे कि 377 के तहत सहमति से बालिगों का समलैंगिक संबंध अपराध है या नहीं। सुनवाई का दायरा बढ़ता है मसलन शादी या लिव इन, तब हम विस्तार से हलफनामा देंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Share