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बुद्ध जयंती कब है, जानिए कौन थे महात्मा बुद्ध

When is Buddha Jayanti: बुधवार, 26 मई 2021 को बुद्ध पूर्णिमा है। बैसाख पूर्णिमा, वैशाख पूर्णिमा को ही बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। यह भगवान बुद्ध का जन्मोत्सव का दिन है। यह गौतम बुद्ध की जयंती है और उनका निर्वाण दिवस भी। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। अत: हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है।

भगवान गौतम बुद्ध का जन्म तब हुआ था, जब कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो रास्ते में लुम्बिनी वन में हुआ। लुम्बिनी नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान है, जहां बुद्ध का जन्म हुआ था। उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया।

इनके पिता का नाम शुद्धोदन था। बुद्ध के जन्म के बाद एक भविष्यवक्ता ने राजा शुद्धोदन से कहा था कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट बनेगा, लेकिन यदि वैराग्य भाव उत्पन्न हो गया तो इसे बुद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता और इसकी ख्याति संसार में कायम रहेगी। जन्म के सात दिन बाद ही मां का देहांत हो गया। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया। सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद् तो पे ही, राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुदौ, तीर-कमान, रथ हांकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता।

बचपन से ही सिद्धार्थ के मन में करुणा भरी थी। उससे किसी भी प्राणी का दु:ख नहीं देखा जाता था। यह बात इन उदाहरणों से स्पष्ट भी होती है। घुदौ में जब घो दौते और उनके मुंह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देते और जीती हुई बाजी हार जाते। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दु:खी होना उससे नहीं देखा जाता था।

एक बार की बात है सिद्धार्थ को जंगल में किसी शिकारी द्वारा तीर से घायल किया हंस मिला। उसने उसे उठाकर तीर निकाला, सहलाया और पानी पिलाया। उसी समय सिद्धार्थ का चचेरा भाई देवदत्त वहां आया और कहने लगा कि यह शिकार मेरा है, मुझे दे दो। सिद्धार्थ ने हंस देने से मना कर दिया और कहा कि तुम तो इस हंस को मार रहे थे। मैंने इसे बचाया है। अब तुम्हीं बताओ कि इस पर मारने वाले का हक होना चाहिए कि बचाने वाले का देवदत्त ने सिद्धार्थ के पिता राजा शुद्धोदन से इस बात की शिकायत की।

शुद्धोदन ने सिद्धार्थ से कहा कि यह हंस तुम देवदत्त को क्यों नहीं दे देते आखिर तीर तो उसी ने चलाया था। इस पर सिद्धार्थ ने कहा- पिताजी! यह तो बताइए कि आकाश में उने वाले इस बेकसूर हंस पर तीर चलाने का ही उसे क्या अधिकार था हंस ने देवदत्त का क्या बिगाा था फिर उसने इस पर तीर क्यों चलाया क्यों उसने इसे घायल किया मुझसे इस प्राणी का दु:ख देखा नहीं गया। इसलिए मैंने तीर निकालकर इसकी सेवा की। इसके प्राण बचाए। हक तो इस पर मेरा ही होना चाहिए।

राजा शुद्धोदन को सिद्धार्थ की बात जंच गई। उन्होंने कहा कि ठीक है तुम्हारा कहना। मारने वाले से बचाने वाला ही बा है। इस पर तुम्हारा ही हक है शाक्य वंश में जन्मे सिद्धार्थ का 16 वर्ष की उम्र में विवाह दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ हुआ। राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहां पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए।

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