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सत्य एक पारदर्शी आंख

जो हितकर है वही सत्य है। ऐसा सत्य जिससे दूसरे को क्षति पहुंचती हो वह असत्य की श्रेणी में आता है। स्व- पर कल्याण की भावना से बोला गया वचन ही प्रामाणिक है। मन की कडुवाहट से युक्त या क्रोध-लोभ-भय व हास्य मिश्रित वचन सत्य होकर भी असत्य की श्रेणी में आते हैं इसीलिए साधु-पुरुषों को चाहिए ‘टू द प्वाइंटÓ बोलें या थोड़ा बोले। यदि दो शब्दों से बात समझ में आती है तो तीसरा शब्द न बोलें। ध्यान रखें! प्रिय बोलें और मौन रख सकें तो सर्वोत्तम है। सत्य को उपलब्ध होने के मायने है जीवन अत्यन्त शान्त और मोह रहित होना।
जब आपका मन सत्य से विमुख हो असत्य की ओर झुकने लगे तो समझना सर्वनाश निकट है।
‘कटु भी हितोपदेश असत्य नहींÓ
हे आत्मन! आप अपने सहपाठियों-सहयोगियों से हितकर वचन बोलें। यद्यपि वह हृदय को अप्रिय हो तो कोई चिन्ता नहीं है। जैसे कटुक औषध भी परिणाम में मधुर और कल्याणकारक होती है वैसे ही आपका भाषण साधकों को कल्याण करेगा।
‘असत्य सर्वथा निषिद्धÓ
* एक बार बोला हुआ असत्य भाषण अनेक बार बोले सत्य भाषणों का संहार करता है। असत्यवादी स्वयं भयभीत रहता है। शंकायुक्त रहता है कि मेरा असत्य भाषण प्रकट होगा तो मेरा बहुत उपहास होगा, निन्दा होगी।
* असत्यभाषी के अविश्वास आदि दोष परलोक में भी प्राप्त होते हैं। अगली जिन्दगी में प्रत्यन्तपूर्वक इनका त्याग करने पर भी इन दोषों का उसके ऊपर आरोप आता है।
‘कटु संभाषण निषेधÓ
‘अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहिं, कोई मुख से कहा करैÓ यही जीवन मंत्र है। यदि तुम्हारे एक शब्द से भी किसी को कष्ट पहुंचता है तो तुम अपनी सब भलाई नष्ट हुई समझो।
आग का जला हुआ तो समय पाकर अच्छा हो जाता है परन्तु वचन का घाव सदा हरा बना रहता है अतएव भाषा समिति के धारकों को कठोर-कर्कशा, परुषा-रूक्ष, कटुका, निष्ठुरा, परकोपिनी, छेदंकरी, मध्यकृशा, अति मानयुक्त अनयंकरा, भूतहिंसाकरी उक्त दशा प्रकार की खोटी भाषा नहीं बोलना चाहिए, उन्हें सदैव हितकारी स्वरूप और सन्देह रहित बोलना ही उचित है।
खोटी भाषा
1. कठोर-कर्कशा अर्थात सन्ताप जनक: जैसे-तुम मूर्ख हो, बैल हो, कुछ नहीं जानते हो, इत्यादि बोलना। क्रमश:

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