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Treatment of naxalism is necessary

नक्सलवाद का इलाज जरूरी

नब्बे के जमाने में नक्सलवाद हर किसी की जुबान पर होता था, आतंकवाद के बाद यह दूसरा शब्द था, जिसके बारे में हर कोई जानता था, जानना चाहता था। हालांकि बीते वर्षों में आतंकवाद की भांति नक्सलवाद भी कमजोर पड़ता गया है, ऐसा सरकारों की सख्ती से हुआ है। हालांकि बीते शनिवार को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलियों ने जिन हालात में और जिस प्रकार हमला सुरक्षाबलों पर हमला किया। उसके बाद से नक्सलवाद ने फिर देश के लोगों के दिलोदिमाग में अपनी दहशत भर दी है। छत्तीसगढ़ और इसके साथ लगते राज्यों में समांनातर सरकार चला रहे नक्सली न जाने क्यों अपने लोगों के भविष्य को अंधेरे में डाले हुए हैं, जबकि प्रत्येक सरकार उन्हें मुख्यधारा में लाने को तैयार है और ला भी रही है। नक्सलियों पर छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार की संयुक्त कार्रवाई में 22 जवानों का शहीद होना बहुत बड़ी हानि है। इस हमले में 31 जवान घायल भी हुए हैं वहीं एक लापता है।

बेशक, नक्सलियों पर कार्रवाई का यह ऑपरेशन लगातार जारी रहता है, लेकिन इस ऑपरेशन के दौरान बरती जाने वाली सावधानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नक्सली किस प्रकार हमला करते हैं और उनकी रणनीति क्या होती है, वहीं उनके ठिकानों के संबंध में भी अब हर जानकारी उपलब्ध है, इसके बावजूद सुरक्षाबलों ने किस प्रकार रणनीति बनाई, जिसमें उन्हें हानि उठानी पड़ी, यह जांच का विषय है। आखिर प्रशिक्षित जवानों पर अप्रशिक्षित और कमतर हथियारबंद नक्सली किस प्रकार भारी पड़ गए, यह भी देश जानना चाहता है।

गौरतलब है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने देंगे, अब नक्सलियों के घर में घुस कर उनसे जंग होगी।  वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी कहा है कि जवान नक्सलियों के गढ़ में लगातार आगे बढ़ रहे हैं, जोकि उनकी बौखलाहट की वजह है। उन्होंने इसे मुठभेड़ नहीं अपितु युद्ध बताया है। उन्होंने यह भी कहा कि पहली बार हमारे जवान नक्सलियों के इलाके से उनके शव और हथियार भी लेकर आए हैं। इस बार नक्सलियों पर हमले का एक सच यह भी है कि भारी तादाद में नक्सली हताहत हुए हैं, लेकिन उन्होंने शवों को वहां से हटा दिया। यानी नक्सली यह भी नहीं दिखाना चाहते कि सरकार की ओर से उन्हें नुकसान पहुंचाया गया है।

मालूम हो, सरकार की ओर से चलाए जा रहे अभियान में 2000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं, जोकि एक खास लक्ष्य के साथ एक विशेष ऑपरेशन पर भेजे गए थे। यह ऑपरेशन कई अलग-अलग स्रोतों से मिली खुफिया सूचनाओं पर आधारित था। वरिष्ठ अधिकारियों की देखरेख में पिछले कई दिनों से इस ऑपरेशन की तैयारी की जा रही थी। इतना सब कुछ होने के बाद भी बताई गई जगह पर कुछ नहीं मिला। ऐसा भी नहीं कि यह सब किसी अत्यंत दुर्गम जंगली इलाके में हुआ हो। जिस जगह वारदात हुई वहां अगले दिन पत्रकारों को पहुंचने में न कोई खास दिक्कत हुई और न ज्यादा वक्त लगा क्योंकि कैंप और मेन रोड से घटनास्थल बमुश्किल आधे घंटे की दूरी पर बताया जाता है।

इससे साफ है कि सूचना इक_ा करने और मिली सूचनाओं की प्रामाणिकता जांचने के हमारे तरीकों में बहुत बड़ी खामियां हैं। इस मामले में न केवल सुरक्षा बलों तक गलत जानकारी विश्वसनीय ढंग से पहुंचाई गई बल्कि सुरक्षा बलों की तैयारियों और उनकी कार्रवाई से जुड़ी एक-एक सूचना भी नक्सलियों को मिलती रही। दूसरा सवाल कारगर और बड़े ऑपरेशन के बीच फर्क का है। क्या कथित नक्सली इलाकों में ज्यादा सुरक्षाकर्मियों वाले बड़े ऑपरेशनों के कारगर होने की भी संभावना रहती है? ताजा हमले ने यह जरूरत एक बार फिर रेखांकित की है कि सुरक्षा बलों के ऑपरेशन को अधिक से अधिक कारगर बनाने के तरीकों पर और ध्यान दिया जाना चाहिए। तीसरा और सबसे पुराना लेकिन बड़ा सवाल है नक्सलवाद के प्रति सरकार और प्रशासन के नजरिये का। पिछले वर्षों में इसे विशुद्ध रूप से कानून व्यवस्था की समस्या मानने का चलन बढ़ा है। इसमें दो राय नहीं कि कोई भी लोकतांत्रिक समाज बदलाव के हिंसक तरीकों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह भी सही है कि हिंसा के प्रयासों को सख्ती से ही कुचलना होगा। लेकिन जिन वजहों से समाज का कोई खास हिस्सा हिंसक रास्ता अख्तियार करने वालों के झांसे में आता है, उन्हें दूर करना भी हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए और हमारी यह प्राथमिकता समाज के उस हिस्से को नजर भी आनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले के बाद अब अगर बिहार पुलिस भी अलर्ट पर है तो उचित ही है।

नक्सल प्रभावित इलाकों में चौकसी पहले के मुकाबले बढ़ा दी गई है। अद्र्धसैनिक बल और पुलिस साझा तौर पर नक्सलियों के खिलाफ अभियान चला रही है। नक्सलियों की गतिविधियों पर नजर रखने को खुफिया विंग को चौकस कर दिया गया है। मालूम हो, बिहार के कई जिले नक्सल प्रभावित हैं। इन इलाकों में नक्सली किसी तरह की वारदात को अंजाम न दे सकें या फिर शरण न ले पाएं इसको लेकर पुलिस अलर्ट पर है। बिहार के गया, औरंगाबाद, जमुई समेत कुछ जिलों में बीते वर्षों में नक्सली हमले हुए हैं। 18 जुलाई 2016 को गया के डुमरिया नाले के पास नक्सलियों द्वारा किए गए आईईडी ब्लास्ट में कोबरा के 10 जवान शहीद हुए थे। 4 जुलाई 2014 को जमुई में सीआरपीएफ की 7 वीं बटालियन के द्वितीय कमांडिंग अफसर हीरा कुमार झा शहीद हुए थे। कई अन्य नक्सली हमले में भी पुलिस व अद्र्धसैनिक बलों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था।

वास्तव में नक्सलवाद ऐसा नासूर है, जोकि रह-रहकर हरा हो जाता है और फिर हिंसा का इतना मवाद फैलाता है कि देश सन्न रह जाता है। क्या वक्त के साथ नक्सलवाद पर नए सिरे से विचार की जरूरत नहीं है, क्या एकमात्र उपाय नक्सलियों को खत्म करने का है। बेशक, कुछ समुदाय और लोगों की मांग पर अलग प्रदेश नहीं बनाए जा सकते, लेकिन उन लोगों की समस्याओं का निराकरण करते हुए उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाकर नक्सलवाद को खत्म किया जा सकता है। वहीं नक्सलियों को भी इसका अहसास होना चाहिए कि समाज के साथ चलकर ही वे तरक्की कर सकते हैं। संभव है, राज्य और केंद्र सरकार हर तथ्य पर गौर करेंगी।

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