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आज प्रतियोगिता का युग है : निरंकारी बाबा

कलयुग जिसका हम लगातार जिक्र करते आ रहे हैं कि तमाम युगों में सबसे नीचे दर्जे वाला कलयुग। तो भक्त इसको इस रुप में देखता है कि तुझसे नाता टूटना यानि कि कलयुयग हो जाना। एक घड़ी तुझको बिसारना कलयुग के समान है, वो नर्क के समान है क्योंकि मन की ऐसी हालत हो जाती है कि जीवन को और ही दिशा मिल जाती है, भाव कुछ और ही बनते चले जाते हैं। इसलिये एक घड़ी की दूरी भी बहुत अखरती है और संसार कैसे जीवन की तमाम घडयि़ाँ इससे जुदा रहकर बिता देता है, इससे दूर रहकर बितादेता है।

इसलिये संसार और परमार्थ इन दोनों की तुलना की जाती है तो संसार में भक्ति का ही पलड़ा महत्वपूर्ण रहा है। यही भरा रहा है, इसी से ऊंचाई रही है क्योंकि संसार की तरफ तो पहले ही सहजता से बढ़ा जा सकता है लेकिन परमार्थ की तरफ सहजता से नहीं बढ़ा जा सकता है। इसीलिये सत्संग की प्रेरणा दी जाती है, महापुरुषों की सोहबत की प्रेरणा दी जाती है, ये संग करने की प्रेरणा दी जाती है। प्रेरणा उसी तरफ दी जाती है जिस पर आशंका होती है कि कहीं पर भी कदम डगमगा सकते हैं, कहीं पर भी ढील हो सकती है। तो उसी तरफ सुचेत बार-बार करना पड़ता है।

संसार की तरफ कब, किसको सुचेत करने की आवश्यकता पड़ती है? संसार की तरफ तो सुचेत करने की जरुरत नहीं पड़ती, जब भी जरुरत पड़ी है सत्संग की तरफ सुचेत करने की पड़ी है, परमार्थ की तरफ, भक्ति की तरफ, सेवा की तरफ सुचेत करने की जरुरत पड़ी है। अगर ये भी सहजता से हो पाता तो कहीं जरुरत नहीं थी कि ऐसे प्रेरणादायक शब्दों का इस्तेमताल किया जाये कि हम सत्संग करें, सेवा करें, हम सुमिरण करें, हम परमार्थ पर चलें, हम नेकी से जीवन जियें, हम ऊंचे अखलाक वाले बनें।

अगर सहज में ही ये हो जाता तो हर इन्सान इस धरती पर बसने वाला वो वाकई ही ऐसी अवस्था में आ चुका होता। लेकिन ये बड़ी चुनौती है। दुनियावी उपलब्ध्यिों के लिये कहते हैं कि ये चुनौति है। आज प्रतियोगिता का युग है। आज कैरियर या शिक्षा के क्षेत्र में कितनी प्रतियोगिता है। जहां कालेज के स्तर पर पहुंचते थे या सीनियर स्कूल स्तर पर पहुंचते थे तब कहीं जाकर अस्सी प्रतिशत से अधिक अंक पाने की बातें होती थें और अभी कहां पर छोटी बस में बच्चे स्कूल जाना शुरु हुए हैं।

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