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समाज के सच्चे गुरु थे महर्षि व्यास, आषाढ़ की पूनम को क्यों की जाती है पूजा

अज्ञानतिमिरांधस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम:॥

अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिए ज्ञान की ज्योति जलाने वाले गुरु और जीवन विकास की कामना रखने वाले शिष्य का संबंध अलौकिक होता है। गुरु के पास बैठकर शिष्य नम्रता, जिज्ञासा और सेवा से युक्त होकर गुरु के पास रहा हुआ ज्ञानामृत ग्रहण करता है। गुरु तो शिष्य के जीवन का ‘पेपर वेटÓ है। जिसके कारण वासना के विचारों से शिष्य की जीवन-पुस्तिका के पन्ने नहीं उड़ जाते।

आषाढ़ की पूर्णिमा अर्थात व्यास पूजा का दिन। व्यास पूजा के पवित्र दिन संस्कृति के निर्माताओं का पूजन होता है। संस्कृति निर्माण का कार्य अलग-अलग ढंग से अनेक ऋषियों ने किया है। परंतु वेदव्यास ने सभी विचारों का संकलन करके हमारी संस्कृति को ज्ञानकोष रूप ‘महाभारतÓ ग्रंथ दिया। ‘भारत: पंचमो वेदÓ उनके इस ग्रंथ को पांचवें वेद की उपमा प्राप्त हुई।

महाभारत द्वारा उन्होंने संस्कृति के विचारों को उदाहरण सहित सरल भाषा में समाज के समक्ष रखा। मुनिनामप्यहम व्यास: ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी प्रशंसा की है। वेदव्यास के जीवन और कवन को अमर बनाने के लिए उनके अनुगामी चिंतकों ने संस्कृति के विचारों का प्रचार करने वाले सभी को ‘व्यासÓ के संबोधन से पुरस्कृत करना निश्चित किया।

संस्कृति के विचार जिस ‘पीठÓ पर से प्रवाहित होते हैं उस पीठ को आज भी ‘व्यासपीठÓ कहते हैं। इस व्यासपीठ पर आसीन होकर जो व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से अपनी उपासना को भक्ति समझकर स्वकर्तव्य रूप से संस्कृति के प्रचार का जीवनव्रत लेता है, उसकी इस दिन पूजा करके कृतकृत्य होना चाहिए।

व्यास को ही हम हिन्दू धर्म के पिता मान सकते हैं। व्यक्ति का मोक्ष और समाज का उद्धार इन दोनों आदर्शों को अभेद बुद्धि से देखने वाले, अभ्युदय और नि:श्रेयस का समन्वय साधने वाले और अध्यात्म-परायण व्यास से बढ़कर कोई समाजशास्त्री नहीं हुआ है। उनका वैदिक और लौकिक ज्ञान इतना अमयाद था कि सर्वज्ञ लोगोंने कृतज्ञतापूर्वक कहा है कि ‘व्यासोच्छिष्टं जगत सर्वम और व्यागिरा महाभारत को ‘सारं विश्वस्यÓ कहा है। मानव नियति को बदल सकता है या अपने स्वभाव को काबू में रख सकता है। यह बात शेक्सपियर को संभव नहीं लगती। इस दृष्टि से देखने पर जीवन के केवल काले पहलू को देखने वाला यह साहित्य सम्राट मानव जीवन के कृष्णपक्ष का ही कवि बना रहा। दूसरी ओर महाकवि कालिदास अपने पात्रों को सर्वथा और सर्वदा निर्दोष आलेखता है। जीवन की उज्ज्वल महिमा गाने वाला यह महाकवि शुक्ल पक्ष का कवि बना रहा। जीवन न तो केवल कृष्णपक्ष है और न ही शुक्ल पक्ष।

महर्षि व्यास ने अपने सभी पात्रों के गुण-दोषों की विस्तृत रूप से चर्चा की है। उन्होंने भीम, अर्जुन या युधिष्ठिर के दोष दिखाए हैं। इतना ही नहीं, अपितु दुर्योधन और कर्ण जैसों के गुणों का भी उन्हें विस्मरण नहीं हुआ। जीवन को उसके समग्र रूप में देखने की हिम्मत रखने वाला आर्षद्रष्टा ऋषि ही जीवन का सच्चा भाष्यकार या मानव का सच्चा पथप्रदर्शक बन सकता है।

व्यास पीठ पर बैठने वाले व्यक्ति को कई पथ्य पालने चाहिए। सबसे प्रथम बात तो यह है कि व्यास पीठ पर से व्यास को अमान्य हो, ऐसा एक भी विचार नहीं कहा जाना चाहिए। इस कारण व्यास पीठ पर से किसी की निंदा या खुशामद नहीं की जाती। व्यास पीठ पर बैठने वाला व्यक्ति सरस्वती का सच्चा उपासक होना चाहिए। उसकी वाणी वाङमयीन विला के लिए नहीं परंतु ईश भक्ति के रूप में प्रवाहित होनी चाहिए। उसकी वाणी सरल, स्पष्ट, गहरी और समाज की उन्नति की साधक होनी चाहिए।

व्यास समाज के सच्चे गुरु थे। इसीलिए परंपरानुगत व्यास पूजा गुरु पूजा कहलाने लगी और व्यास पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाई जाने लगी। निर्जीव वस्तु को ऊपर फेंकने के लिए जिस तरह सजीव की जरूरत होती है उसी तरह लगभग जीवनहीन और पशुतुल्य बने मानव को देवत्व की ओर ले जाने के लिए तेजस्वी व्यक्ति की आवश्यकता रहती है।

जीवन न तो केवल प्रकाश और न केवल अंधकार

महर्षि व्यास जीवन के सच्चे भविष्यकार हैं। कारण यह है कि उन्होंने जीवन को उसके समग्र स्वरूप में जाना है। जीवन न तो केवल प्रकाश है और न केवल अंधकार! जीवन तो है प्रकाश-छाया की आंख-मिचौनी, ज्वार-भाटा का खेल और सुख-दु:ख का समन्वय। महर्षि व्यास का कहना है कि हमारा जीवन तो काले और सफेद तंतुओं से बना हुआ वस्त्र है। सद्गुण और दुर्गुण जीवन में साथ ही देखने को मिलते हैं। आंग्ल कवि शेक्सपियर और संस्कृत भाषा के कवि कालिदास भी व्यास की तुलना में कम ही हैं। शेक्सपियर अपने नाटकों में समृद्धि के शिखर पर चढ़े हुए मानवों का पतन चित्रित करता है। वह नियति, श्रेष्ठत्व और स्वभाव के स्वामित्व को स्वीकार करता है- अर्थात मानव नियति के हाथ का खिलौना है और वह स्वभाव से मजबूर है।

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