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मानव जीवन का उद्देश्य सत्य को जानना : निरंकारी बाबा

मानव जीवन का यही उद्देश्य है, यही प्रयोजन है कि हर इन्सान इस सत्य को, इस हरि का, इस निरंकार को प्राप्त करें जो कल भी था, आज भी है और आगे भी रहने वाला है। जा कभी कम ज्यादा होने वाला नहीं। बाकी सब चीजें तो कम-ज्यादा होने वाली हैं। एकरस रहने वाली नहीं। जितनी भी चीजें इससंसार में देख रहे हैं, सूरज है, धरती है, पानी है। पानी कभी गर्म होता है, कभी ठण्डा होता है सर्दियों में बरफ भी बन जाता है और गर्म करने से तो वह भाप भी बन जाता है। वह कभी एकरस नहीं रहता। इसी तरह से सूरज भी एकरस नहीं रहता। सूरज भी एक समय पर है, लेकिन थोड़ी देर के बाद वहां पर सूरज नहीं होता, उसकी रोशनी नहीं होती। जैसे अभी आप देखते हैं कि इस समय सूरज की रोशनी यहां पर नहीं, यह धरती के दूसरी तरफ चली गई है।

इसी तरह से सभी चीजें जो हम देाते हैं, ये एकरस नहीं रहती हैं। स्थिर नहीं रती हैं। अगर इन्सान इन्हीं के ऊपर निर्भर करता है तो जिस तरह से ये डुलायमान है, एकरस नहीं रहती, इसी तरह से इन्सन के मन को भी चैन नहीं मिलता, इसको भी स्थिरता प्राप्त नहीं होती। यह सहज अवस्था कब प्राप्त होती है? जब इस सहज प्रभु के साथ हमारा नाता जुड़ जाता है, जो एकरस रहने वाला है। चाहे समय कैसा भी आ जाए, चाहे हम किसी भी स्थान पर चले जायें, यह एकरस ही रहता है। हमेशा कायम-दायम रहता है। इस कायम-दायम रहने वाली सत्ता के साथ जितना भी नाता जोड़ लिया जाता है, वह हमेशा के लिए एकरस अवस्था वाला संत बन जाता है।

इस आत्मा (चेतन सत्ता) के कारण ही इस शरीर का चलना फिरना है, यही जीवन है। इसी की वास्तव में हमने पहचान करनी हे कि हम यह शरीर नहीं, बल्कि एक आत्मा हैं। आत्मा की ही महत्ता है। अगर आत्मा को हमने पाया नहीं और सभी काम हम करते रहे, शरीर को सजाते श्रृंगारते रहे, इसको धष्ट-पुष्ट करते रहे, लेकिन इस आत्मा का हमने कुछ नहीं किया, इस मन को हमने इस प्रभु के साथ नहीं जोड़ा, तो हमारा इस संसार में आना व्यर्थ ही चला जाएगा। तभी तो महापुरुषों ने कहा है कि-

रैणि गवाई सोई कै दिवसु गवाइआ खाइ।
हीरे जैसा जनमु है कउडी बदले जाइ।।

हीरे जैसा अमोलक जन्म भी कौडिय़ों के भाव चला जाता है। महापुरुषों ने जो भी इस प्रभु के बारे में कहा है, इस पर हमें विचार करना है। इसे अपनाना है।

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