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साध्वी प्रज्ञा ‘प्रखर हिंदुत्व’ का नया चेहरा

भारतीय जनता पार्टी को अरसे से जिस नेता की आवश्यकता थी, लगता है प्रज्ञा ठाकुर के रूप में वह पूरी हो गई है। साध्वी उमा भारती और अन्य साध्यिवों की ‘रिटायरमेंट’ के बाद पार्टी का हिंदुत्ववादी चेहरा फीका पडऩे लगा था और हालात ऐसे बन गए थे, कि विपक्षी जिन्हें कभी मंदिर के दरवाजे चढ़ते नहीं देखा, वे मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना के जरिये अपनी हिंदू विरोधी छवि को तोडऩे में सफल होने लगे थे।

मालेगांव धमाके में आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल जोकि भाजपा की परंपरागत सीट है, से टिकट देकर पार्टी ने हिंदुत्ववाद की सूख चुकी अपनी नशों में फिर से गर्म खून को दौड़ा दिया है। टिकट मिलने के बाद महज दो बयानों से उन्होंने देशभर में जैसी सनसनी पैदा कर दी है, उससे आरएसएस और भाजपा की कमान अपने फैसले पर संतोष जता रहे होंगे। हालांकि चुनाव आयोग की नजर उन पर है, मुंबई हमले में शहीद हुए एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे पर उनके विवादित बयान के बाद आयोग ने नोटिस जारी किया है।

करकरे के संबंध में साध्वी ने जो कहा वह एक ऐसी आपबीती है जोकि देश के पुलिस सिस्टम की पहचान बन चुकी है। साध्वी ने दावा किया है कि हिरासत के दौरान 15 से 20 पुरुष आकर उन्हें बेल्ट से पीटते थे। यह बयान राजनीतिक ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया गया है या नहीं, इसकी उत्सुकता सभी के मन में हो सकती है, लेकिन आरोपी से राज उगलवाने के लिए पुलिस प्रणाली को रिमांड के नाम पर ऐसी छूट न्यायिक सिस्टम भी देता है।

जाहिर है, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को शहीद करकरे से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी, लेकिन हिरासत के दौरान जो उनके साथ बीता, यह उस पीड़ा का अतिवादी रूप था, जो उनके मन में दुर्भावना के रूप में पनप रहा था और जिसे उन्होंने ‘श्राप’ का नाम दिया है। वास्तव में अपराधी से सच उगलवाने के लिए पुलिस जिस हद तक जा सकती है, वह जाती है लेकिन इस दौरान आरोपी के मानवाधिकार का कोई मतलब नहीं समझा जाता। हालांकि यह जरूर कहा जाना चाहिए कि अगर साध्वी के साथ उस समय ऐसा हो रहा था तो उन्होंने इसकी सूचना अदालत को क्यों नहीं दी?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह के मुकाबले खड़ीं साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के पहले बयान पर देशभर में कशमकश जारी है, लेकिन इस बीच उनके दूसरे बयान ने फिर हलचल पैदा कर दी है। संघ चाहता है कि राम मंदिर बनाया जाए, साधु-संत भी यही चाहते हैं, शिवसेना पश्चिमी से निकल कर अयोध्या में कैंप लगा कर इसके बनवाने का बीड़ा उठा चुकी है। ऐसे में चारों तरफ से दबाव झेल रही भाजपा के सामने मंदिर के निर्माण के संकल्प को जिंदा रखने की चुनौती है, वहीं अपने विरोधियों जोकि नरम हिंदुत्व का चेहरा ओढ़ बैठे हैं, के हाथों से इस मसले को छिनने की भी जरूरत है।

इस जरूरत को पूरा करते हुए साध्वी प्रज्ञा ने बयान दे दिया है। उनका कहना है कि बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराकर उन्होंने ‘देश का कलंक’ मिटाया था। उन्होंने यह भी दावा किया है कि खुद उस ढांचे पर चढ़ कर उन्होंने इसे तोड़ा। इसके बाद चुनाव आयोग ने उन्हें एक और नोटिस जारी कर दिया है।

दरअसल, राजनीतिक दल भ्रष्ट और अपराधियों को टिकट देकर चुनाव में खड़े करते आए हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब ‘धार्मिक आंतकवाद’ से जुड़े मामले के आरोपी को उम्मीदवार बनाया गया है। जाहिर है, भारत में हिंदुत्ववाद, राममंदिर जैसे मसले कभी खत्म नहीं होंगे। इस चुनाव में भाजपा के पास एक भी ऐसा उम्मीदवार या नेता नहीं था जोकि हिंदुत्ववाद का इस कदर प्रखर चेहरा हो। ऐसे में आरएसएस से आदेश हासिल करके भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को आगे करके बहुत बड़ी लड़ाई शुरू की है। वे अपने चुनाव को धर्मयुद्ध का नाम भी दे चुकी हैं।

हालांकि उनके विरोधी कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह हिंदुत्व से दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन अब यह कहकर कि ‘उनकी डिक्शनरी में हिंदुत्व जैसा शब्द है ही नहीं’, उन्होंने इस दूरी को और बढ़ा दिया है। बहरहाल, भोपाल हॉट सीट बन चुका है। अभी तक किसी बड़े नेता ने यहां आकर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर या दिग्विजय सिंह के पक्ष में रैली नहीं की है, जिस दिन यह हुआ, उस दिन संभव है, बयान आसमानी बिजली से भी ज्यादा तड़कते हुए निकलेंगे।

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