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देश हित के आड़े हैं तुच्छ सियासी स्वार्थ

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देशभर में विपक्ष का हल्लाबोल जारी है। इस मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कड़वाहट का निरंतर बढऩा लोकतांत्रिक व्यवस्था में शुभ संकेत नहीं। कांग्रेस इस कानून का विरोध करते हुए भले ही रुग्णावस्था से कुछ उबरी हो लेकिन कुछ दलों को राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण कांग्रेस की मजबूती सुहाती नहीं। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से विपक्ष को एकजुट के लिए बुलाई गई बैठक में तृणमूल कांग्रेस, बसपा और आम आदमी पार्टी का न जाना इसका ताज़ा उदाहरण है।

गौरतलब है कि कांग्रेस की बुलाई बैठक में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद,भाकपा के डी राजा, रालोद के अजित सिंह तथा कई अन्य नेता शामिल हुए। इस बैठक का एजेंडा था नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों, जेएनयू, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और कुछ अन्य विश्वविद्यालयों में हिंसा के बाद के हालात, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और कृषि संकट पर विपक्ष को लामबंद करना।अब जल्द ही संसद का बजट सत्र शुरू होने जा रहा है।

जागीर हाई हमेशा की भाँति विपक्ष एक बार फिर अपनी एकजुटता की कोशिश से सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने की रणनीति तैयार करेगा। 2019 के आम चुनावों के परिप्रेक्ष्य में भी कांग्रेस ने विगत वर्ष कर्नाटक के सियासी घटनाक्रम के दौरान विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया था। अब नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी जैसे ज्वलंत मुद्दों के जरिए मिले विपक्षी एकता के अवसर को वह हाथ से जाने नहीं देना चाहती।

हालांकि विपक्ष में बैठे दो प्रमुख दल तृणमूल कांग्रेस और बसपा की कांग्रेस से दूरी के राजनीतिक मतलब समझे जाने जरूरी हैं। बसपा ने इस बैठक में न आने बताया है कि राजस्थान में कांग्रेस सरकार को उस की ओर से समर्थन दिये जाने के बावजूद कांग्रेस ने बसपा के विधायकों को तोड?र उन्हें अपनी पार्टी में शामिल करा लिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती के शब्दों में यह सरासर विश्वासघात है। बसपा नेता का कहना है कि कांग्रेस की ओर से बुलाई गई इस बैठक में हिस्सा लेने का मतलब क्या राजस्थान में बसपा के लोगों का मनोबल गिराना नहीं होगा।

बैठक से आम आदमी पार्टी ने किनारा दिल्ली के आगामी चुनाव में भाजपा के साथ साथ कांग्रेस के भी ख़िलाफ़ बराबर ताल ठोंकने के कारण किया है। वहीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एवं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही कह चुकी हैं कि इस मुद्दे पर वह अकेले लड़ेंगी। अब जबकि लगभग पूरा विपक्ष भाजपा सरकार के खिलाफ एक जैसे मुद्दों को लेकर खिन्न हो तब विपक्ष की आपसी असहमति का मतलब निजी और तुच्छ स्वार्थ नहीं तो और क्या है।

उधर मोदी सरकार उनकी फूट में रही सही कसर पूरा करने में जुटी है। उसका दावा है कि विपक्ष खुद ही नागरिकता संशोधन कानून के संबंध में देश में भ्रांति पैदा करने में जुटा है लेकिन उसके जाल में वह खुद फंसता जा रहा है। यह भी आरोप है कि वामपंथ जोकि इतिहास के पन्नों में दरकने को तैयार है अब शैक्षणिक संस्थानों में गुंडागर्दी करवा कर खुद को जिंदा रखने की कोशिश में है। भारत बंद के दौरान पश्चिम बंगाल में वामपंथी कार्यकर्ताओं ने जिस हिंसा का प्रदर्शन किया वह ममता बनर्जी को भी अखर गया। उनकी राज्य में अपनी सरकार है और वह कानून व्यवस्था को वामपंथियों के हाथों बिगडऩे नहीं दे सकती।

हालांकि यह बात दीगर है कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता बेशक ऐसी आजादी हासिल कर लें। उनका यह बयान भी अहम है कि वामपंथियों और कांग्रेस के दोहरे मानदंड को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वह इस मुद्दे पर कांग्रेस को कोई भी लाभ देने के मूड में नहीं है। इसीलिए तो ममता राज्य विधानसभा में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ पारित प्रस्ताव को लेकर अपनी पीठ ख़ुद ही थपथपा रही हैं। इसके अलावा जेडीयू नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने भी नागरिकता संशोधन कानून पर विपक्ष के साथ न चलकर भाजपा से ही सुर मिलाए हैं।

इस बीच भाजपा का कहना है कि अब यह नौटंकी बंद होनी चाहिए क्योंकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि जिन तीन देशों के मुस्लिमों को यहाँ नागरिकता का प्रावधान नहीं है उन देशों के योग्यता पूरी करने वाले मुस्लिम भी चाहें तो औपचारिक प्रक्रिया के माध्यम से भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। युवाओं के भविष्य की ख़ातिर अब शिक्षा के मंदिरों में शांति की घंटी बजने की दरकार है। लेकिन यह तब ही सम्भव है अगर सत्तापक्ष और विपक्ष दोनो ही निहित स्वार्थों को पीछे छोड़ कर देश हित में सूझबूझ से आगे बढ़ें।

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