Saturday, September 21, 2019
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धर्म के मूल स्तंभ हैं दया, तप, सत्यता व शुचिता तथा शौच व क्षमा है : मुनिश्री विनय कुमार जी

धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ है वे नियम जिन पर चलने से समाज में नैतिकता व मानवता बनी रहे। धर्म के मूल स्तंभ हैं- दान, दया, तप, सत्यता व शुचिता तथा शौच व क्षमा इत्यादि। धर्म के नियमों पर चलने के उपरांत मानव हृदय निर्मल हो जाता है तथा इस स्थिति में करुणा जन्म लेती है। करुणा के कारण दया व क्षमा का भाव जाग्रत होता है। इन दोनों गुणों के कारण मानव, मानव से प्रेम करने लगता है व दूसरों को दुख से निकालने की कोशिश करने लगता है।

हिंदुस्तान धर्म के नक्शे कदम पर चलने वाला राष्ट्र है फिर भी हर जगह संकीर्णुताओं के बोझ तले इंसान दबा हुआ है छोटी सोच, नकारात्मक सोच, एक दूसरे को गिराकर खुद आगे बढने वाली सोच से ग्रस्त है। इसका एक ही कारण है कि हम सभी किसी ना किसी धर्म को तो मानते है लेकिन धर्म जो कहता है वह नही करते। धर्म जो सिखाता है वह नही सीखते। है। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने आचार्य श्री महाप्रज्ञ जन्मशताब्दी वर्ष पर आयोजित विराट धर्म सम्मेलन को संबोधित करते हुए।

धर्म सम्मेलन की अध्यक्षता एस.एस. कंडल पूर्व जनरल ने की। इसके अलावा मुनिश्री अभय कुमार जी, रसिक जी महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर जूना अखाड़ा (हरिद्धार), जामा मस्जिद के ईमाम मौलाना अजमल खां, चंडीगढ़ समूह गुरूद्धारा प्रबंधक संगठन स. चेयरमैन नायाब सिंह, आदि विभिन्न धर्मो, संप्रदायों के प्रतिनिधि धर्म सम्मेलन मे सम्मलित हुए।

मनीषी संत ने आगे कहा आज के समाज में चारों तरफ फैले हुए नैतिक पतन ने हमारे धर्म का असली अर्थ भुला दिया है। पहले समाज में अग्रणी लोगों में दया व दान की भावना थी। इस कारण उस समय शिक्षा व चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में ज्यादातर स्कूल, कॉलेज व चिकित्सालय दान पर आधारित संस्थाएं चलती थीं।

उस समय इन संस्थानों में पैसा तथा रुतबा का कोई स्थान एक आम नागरिक को इनकी सुविधा प्राप्त करने में बीच में नहीं आता था, परंतु आज मानवता की सेवा के ये प्रमुख केंद्र दया, दान व करुणा की भावना से कोसों दूर चले गए हैं तथा आज इनकी मूलभूत सेवाओं में धन कमाने की भावना ने दान व दया को दूर कर दिया है। दया व क्षमा का वर्तमान समय में सर्वथा अभाव हो गया है।

हिंसा व घृणा फैलाने वाले मानवता के लिए नुकसानदायक : श्री रसिक जी महाराज
अणुव्रत भवन सैक्टर 24 में आयोजित सर्व धर्म समभाव संत सम्मेलन में नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने कहा कि भगवान नहीं ह्रदय में पहले भाव आता है। भाव आ जाएगा तो भगवान् को आते देर ना लगेगी। भाव से ही भव बंधन कटते हैं। भाव से भव सागर पार होता है। पदार्थ को नहीं भक्त के भाव को ठाकुर जी ग्रहण करते हैं। भाव भगवान् की कृपा से प्रगट होता है और सत्संग संतों की कृपा से प्रगट होता है। दुनिया में कुछ भी छूटे छूट जाने देना, कथा का त्याग मत करना। शास्त्रों के सूत्र संत की कृपा से जल्दी ह्रदय में उतरकर आचरण बन जाते हैं। रसिक बनना है तो भैया संतों चरणों में बैठना आना चाहिए। संत सत्य तक पहुंचा देता है। उर ( ह्रदय ) के मैल को संत कृपा करके दूर कर देते हैं। भाव भी संत की कृपा से प्रगट होता है। सत्य के आश्रय के साथ-साथ संत आश्रय और हो जाये तो कल्याण होते देर ना लगेगी।

धर्म का तात्पर्य सभी को अपने अंदर समा लेना: आचार्य महामंडलेश्वर
आचार्य महामंडलेश्वर जूना अखाड़ा ने धर्म सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा भारत में सदैव राजनैतिक एकता रही । राष्ट्र व सम्राट, महाराजाधिराज जैसी उपाधियां, दिग्विजय और अश्वमेध व राजसूय यज्ञ भारत की जाग्रत राजनैतिक एकता के द्योतक रहे हैं । यही कारण है कि देश के भीतर छोटे-मोटे विवाद, बड़े-बड़े युद्ध और व्यापक उथल-पुथल के बाद भी राजनैतिक एकता का सूत्र खण्डित नहीं हुआ । साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयता और ऐसे ही अन्य तत्व उभरे और अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियों ने उनकी सहायता से देश की राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने का प्रयास किया, किन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो पाये ।जब देश के भीतर युद्ध, अराजकता और अस्थिरता की आंधी चल रही थी तब भी कोटि-कोटि जनता के मन और मस्तिष्क से राजनैतिक एकता की सूक्ष्म, किन्तु सुदृढ़ कल्पना एक क्षण के लिए भी ओझल नहीं हो पाई ।

भारत सभी धर्मो व संप्रदायो का संगम : मौलाना अजमल खां
भारत के सभी धर्मों और सम्प्रदायों मे बाह्य विभिन्नता भले ही हो, किन्तु उन सबकी आत्माओं का स्रोत एक ही है । मोक्ष, निर्वाण अथवा कैवल्य एक ही गन्तव्य के पृथक-पृथक नाम हैं । भारतीय धर्मों में कर्मकाण्डों की विविधता भले ही हो किन्तु उनकी मूल भावना में पूर्ण सादृश्यता है ।इसी धार्मिक एकता एवं धर्म की विशद कल्पना ने देश को व्यापक दृष्टिकोण दिया जिसमें लोगों के अभ्यन्तर को समेटने और जोडऩे की असीम शक्ति है । नानक, तुलसी, बुद्ध, महावीर सभी के लिए अभिनन्दनीय हैं । देश के मन्दिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों के समक्ष सब नतमस्तक होते है; तीर्थों और चारों धामों के प्रति जन-जन की आस्था इसी सांस्कृतिक एकता का मूल तत्व है।

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